बुधवार, 10 दिसंबर 2008

आखिर भाजपा क्यों नहीं जीत सकी दिल्ली का दिल

कहां हुई भूल, क्यों नहीं खिला फूल

कहीं भूल, कहीं गलती और कहीं अति आत्मविश्वास बना हार का कारण
दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
टिकट वितरण में हुई मनमानी
पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय साबित हुआ गलत
जनाधार वाले स्थानीय नेताओं की हुई उपेक्षा
परिसीमन के दौरान निष्क्रियता से ही शुरु हुआ हार का सफर
संगठन चुनाव में चहेतों को बांटे पद
आम कार्यकर्ता संगठन से हुआ दूर
अनिवासियों की ताकत को नहीं समझ पाई भाजपा
पार्टी के दिग्गजों की चिंता रही सिर्फ चहेतों को जिताने पर
अनेक गलत फैसले पड़े भारी
प्रत्याशियों के पास थी कार्यकर्ताओं की कमी
स्टार प्रचारकों की सभाओं में भी उलझे रहे प्रत्याशी व कार्यकर्ता
मुद्दों का सही चयन नहीं कर पाये चुनाव मैनेजर
जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन नहीं चला
मुख्यमंत्री पद पर मल्होत्रा को भी स्वीकार नहीं कर पाये मतदाता
अंत तक उठते रहे बगावत के स्वर
बसपा ने ही बचाई लाज
अनाधिकृत कालोनियों को सर्टीफिकेट पडे महंगे

संजय टुटेजा
अब मंथन होगा, हार का मंथन, कहां तो शानदार जीत और सरकार बनाने के सपने और कहां शर्मनाक हार। एैसी हार जिसने भाजपा के चुनाव मैनेजरों को शर्मसार कर दिया है। पार्टी के दिग्गज आज नजरे चुरा रहे हैं, नजरें मिलाएं भी तो कैसे, आखिर अंतिम समय तक आत्मविश्वास से लबरेज जीत के नगाड़े पीटे जा रहे थे। अब कोई मुद्दो को गलत बताकर अपना बचाव कर रहा है तो कोई चुनाव प्रबंधन और टिकट वितरण को हार का जिम्मेदार मान रहा है। इन मैनेजरों के पास तो अब भी बचाव के पचास बहाने हैं लेकिन आम कार्यकता इस हार से आहत है। कार्यकर्ताओं की पीड़ा यह है कि मात्रा एक महिला शीला दीक्षित से एक पूरा संगठन हार गया। कार्यकर्ताओं की जबान परं बस एक ही सवाल है कि जब एक महिला एक पूरी पार्टी को विजयी बना सकती है तो फिर एक पूरी पार्टी और तमाम स्टार प्रचारक दिल्ली का दिल क्यों नहीं जीत सके।
अब फिर शुरुआत होगी, सत्ता के सफर की नई शुरुआत और पांच वर्ष का लंबा इंतजार। प्रदेश भाजपा के तमाम दिग्गज अब हार के मंथन और विशलेषण की बात कर रहे हैं, मंथन तो पिछली हार के बाद भी हुए थे और विशलेषण कर कमियां भी ढूंढी गई थी लेकिन फिर गलतियां हुई, फिर भीतरघात हुई, फिर मनमानी हुई और एक बार फिर निश्चित जीत के सपने भी देखे गये। सपनों को साकार करने की पहल न तो 1998 की हार के बाद शुरु हुई और न ही वर्ष 2003 की हार के बाद शुरु हुई, आज आम कार्यकर्ताओं का यही कहना है कि यदि पार्टी ने सचमुच दिल्ली का दिल जीतने की कोई पहल पिछले दस वर्षो में की होती तो निश्चित रूप से पार्टी के तमाम दिग्गज आज इस शर्मनाक हार पर शर्मसार न होते। जिन विधानसभा सीटों पर भाजपा अपनी साख बचाने में कामयाब रही है वहां का आम कार्यकर्ता भी पार्टी के भीतर बढ़ती सामंतवादी प्रवृति से दुखी है। एक अनुशासित पार्टी के कार्यकर्ताओं की टीस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश मुख्यालय पर आज बुराड़ी की एक महिला कार्यकर्ता की आंखों में बुराड़ी की जीत पर खुशी नहीं बल्कि अपने नेताओं की मनमानी को लेकर गुस्सा और चेहरे पर टीस थी।
आम कार्यकर्ता की जबान पर जो सवाल हैं उनमें से किसी का जवाब पार्टी व इस चुनाव के मैनेजरों के पास नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष डा.हर्षवर्धन बस यह कह कर चुप हो जाते हैं कि ‘एैसी उम्मीद नहीं थी’ तो उधर चुनाव के प्रमुख मैनेजर अरुण जेटली साफगोई से हार की जिम्मेदारी ले रहे हैं लेकिन कार्यकर्ता यह पूछ रहे हैं कि क्या दिग्गजों के यह बयान पार्टी का कुछ भला कर पायेंगे। कांग्रेस की दस वर्षो की सत्ता के बावजूद न तो इनकमबैंसी का असर और न ही सरकार के प्रति जनता की नाराजगी का कोई असर। आखिर सरकार की खामियों को क्यों नहीं भुना पाई भाजपा, इसके एक नहीं अनेक कारण है और अब आम कार्यकर्ता इन्हीं कारणों का पोस्टमार्टम चाहता है।

परिसीमन से ही शुरु हो गई थी हार
विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की शुरुआत तो परिसीमन से ही हो गई थी। परिसीमन के दौरान ओपी कोहली व प्रो।विजय कुमार मल्होत्रा को परिसीमन में भाजपा की राय रखने की जिम्मेदारी पार्टी ने दी थी लेकिन 70 विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन कांग्रेस नेताओं के प्रस्ताव पर हो गया और भाजपा की ओर से प्रस्ताव तक तैयार नहीं किया गया, नतीजतन कांग्रेस के नेताओं ने विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन अपनी जीत के समीकरणों के अनुसार कराया।

दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
दस वर्ष पूर्व प्रदेश में भाजपा सरकार के पतन के बाद भाजपा प्रदेश में कोई एैसा बड़ा नेता विकसित नहीं कर पाई जिसकी दिल्ली की आम जनता तक पकड़ हो। पार्टी के कार्यकर्ताओं को पूर्व मुख्यमंत्राी मदनलाल खुराना जैसे नेता की कमी आज भी खलती है। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज व मुख्यमंत्राी पद के उम्मीदवार प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा जैसे नेता तो हुए लेकिन इनमें से किसी भी नेता ने दिल्ली को अपना कर्मक्षेत्रा नहीं बनाया और राष्ट्रीय राजनीति में ही अपना भविष्य तलाशने की कोशिश की। पिछले पांच वर्ष में प्रदेश स्तर पर डा.हर्षवर्धन, विजय गोयल व प्रो.जगदीश मुखी अपना कद इतना ऊंचा नहीं कर सके कि वह सर्वमान्य नेता बन सकें। जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन भी प्रदेश भाजपा पिछले दस वर्ष में नहीं चला सकी।
प्रत्याशियों के चयन पर सवाल
विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जो उम्मीदवार उतारे उनमे अधिकतर एैसे थे जिन्हें या तो किसी दिग्गज से दोस्ती का इनाम टिकट के रूप में मिला था या किसी को जी हजूर का ईनाम टिकट के रूप में मिला था। प्रत्याशियों के चयन हेतु गठित चयन समिति के अधिकतर सदस्य स्वयं कोई सुझाव देने के बजाय अपने टिकट के लिए स्वयं मल्होत्रा, जेटली व प्रदेश अध्यक्ष की जी हजूरी करते रहे। मल्होत्रा, जेटली और हर्षवर्धन की तिकड़ी संभावित जीत देख रही थी और अपने अधिक से अधिक चहेतों को विधानसभा में पहुंचाने की जुगत में रही।
गलत फैसले भी बने हार का कारण
भाजपा नेतृत्व अब दिल्ली में हार के मंथन के दौरान हार का दोष जिस पर भी मढ़े लेकिन हार का कारण नेतृत्व के गलत फैसले भी थे। एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्राी पद पर प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा का चयन पार्टी का गलत फैसला था तो पार्टी के ही कई नेता पार्टी द्वारा उठाये गये मुद्दों को भी गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्थानीय समस्याओं से जुड़े मुद्दे उठाने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह दी गई। अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में कमजोर व नये प्रत्याशी होने के कारण प्रत्याशियों के साथ आम कार्यकर्ता ही नहीं जुड़ा जिन क्षेत्रों में कार्यकर्ता सक्रिय भी हुए वहां स्टार प्रचारकों में उलझे रहे। पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय भी पार्टी के मैनेजरों पर भारी पड़ा। यदि जीतने में सक्षम पार्षदों को टिकट दिया जाता तो स्थिति विपरीत हो सकती थी।

1 टिप्पणी:

umeshawa ने कहा…

अच्छा विश्लेषण!!! लेकिन क्या इस पार्टी मे ऐसा कोई है जो आप जैसे संवेदनाओ के सहारे इस पार्टी के लिए सोचने वाले लोगो की कद्र करे ???