सोमवार, 2 नवंबर 2009

हम कब सीखेंगे एक शहर मे रहने की तहजीब

एक्सरे : क्या ये है एक सभ्य शहर की तहजीब

  • जगह जगह करते हैं पानी की बरबादी
    बातचीत के लहजे में आखिर क्यो है रुखापम
    आफिस हो या घर दीवारें हो गई हैं पीकदान
    सड़क पार करने का नहीं है सलीका
    फुट ओवर ब्रिज के बावजूद जान जोखिम में डालकर करते हैं सड़क पार
    अंडर पास को हमने खुद बना दिया है नशेड़ियों व भिखारियों का अड्डा
    भिखारियों को बढ़ावा देकर दे रहे हैं भिक्षावृति को प्रोत्साहन
    यहां की भिक्षावृति है विदेशियों के सामने एक बड़ा कलंक
    वाहन चालक सड़कों पर रेड लाइट जम्प करने में महसूस करते हैं गौरव
    रेड लाइट पर जेब्रा क्रासिंग से आगे गाड़ी खड़ी करने से मिलती है आत्म संतुष्टि
    सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने में हम हैं माहिर
    सरकारी सम्पत्ति को नष्ट करना हो गया है हमारा अधिकार
    यातायात नियमों का पालन करने में हमें होती है शर्मीन्दगीसड़कों पर पैदल चलने का भी नहीं है सलीका
    पैदल चलते वक्त महिलाओं को घूरती हैं निगाहें
    सड़कों पर मौज मस्ती के नाम पर अशलील हरकतें
    सड़कों पर जगह जगह थूकना मानों है हमारा अधिकार
    कूड़ा फैंकने के लिए आखिर क्यों उठायें कूड़ेदान तक जाने की जहमत
    सार्वजनिक स्थानों पर ध्रुमपान तो हम करेंगे ही
    बसों में ड्राइवरों, कंडक्टरों का व्यवहार है जगजाहिर
    बसों में अन्य यात्रियों से अभद्र व्यवहार में हम स्वयं भी नहीं हैं कम
    बात बात पर है झगड़ने की आदत
    बसों में महिलाओं से छेड़खानी का ढूंढते हैं बहाना
    अपने काम के प्रति नहीं होंगे जिम्मेदार
    मेट्रो, बस व ट्रेनों में चढ़ने की नहीं सीखेंगे तहजीब
    धक्का मुक्की करना अब हो गई है आदत
    स्टेशन पर ट्रेन खड़ी होने के बाद ही करेंगे ट्रेन के शौचालय का प्रयोग
    सार्वजनिक स्थानों पर शौच व लघुशंका से नहीं है गुरेज
    सार्वजनिक शौचालयों में फैलाते हैं गंदगी
    बात बात पर झूठ बोलना हो गया है दिनचर्या का हिस्सा
    सामने वाले को हरगिज नहीं देंगे तरजीह
    सामने वाले पर अपनी बात थोपना है हमारा अधिकार
    शराब पीकर वाहन चलाने में आता है मजा
    सड़कों पर स्पीड लिमिट का उल्लंघन करके ही मिलती है आत्म संतुष्टि
    पर्यावरण की चिंता हम क्यों करें, करेगी सरकार
    सड़कों के किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर नशा करना है आदत
    अगर हम आटो व टैक्सी चालक हैं तो मनमानी दरों पर ही यात्राी को ले जायेंगे
    अपने बच्चों को भी नहीं सिखा रहे हैं सभ्य नागरिक जीवन के संस्कार
    प्राचीन धरोहरों को कर रहे हैं खुद ही नष्ट
    नदियों नहरों में ही डालेंगे अपनी समूची गंदगी

    सवाल हमारी सभ्यता की साख का

  • अब तो सवाल साख का है, ये सवाल देश की साख का है, हमारी सभ्यता की साख का है और हमारी संस्कृति की साख का है। क्या सचमुच हमारी असभ्य हरकतों ने देश की साख बचाये रखने का संकट खड़ा कर दिया है, यही एक बड़ा सवाल है जो कामनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए तैयार हो रही देश की राजधानी की आम जनता से पूछा जा रहा है। विडंबना यह है कि अब देश की साख को बचाने के लिए जनता को जगाने की तैयारी कर रही सरकार स्वयं भी सोयी है। यह ठीक है कि सिविक सेंस के लिए हमें जागना होगा लेकिन जगह जगह स्वयं कई नागरिक समस्याएं उत्पन्न करने वाली सरकार को कौन जगायेगा। सरकार सेर तो आम जनता सवा सेर, आम जनता अपनी तहजीब भूल रही है तो सरकार अपना फर्ज भूल रही है। देश की राजधानी दिल्ली की 80 प्रतिशत जनता प्रतिदिन कदम कदम पर सिविक प्राब्लम (नागरिक समस्याओं) से रूबरू होती है और अंततः इन समस्याओं का हिस्सा बनकर समस्याओं को तो विकराल बना ही रही है अपनी मानसिकता को भी ं विकृत बना रही है, यही कारण है कि अब यही विकृत मानसिकता हमारी सभ्यता के रूप में दिखाई देने लगी है। देश के गृहमंत्राी पी.चिदंबरम हों या फिर मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित, इनका कहना है कि दिल्ली वासियों को शहरों में रहने के तौर तरीके सीखने होंगे। इनके कहने का निहितार्थ यही है कि यदि दिल्ली वासियों ने अच्छे व बडे शहरों में रहने के तौर तरीके न सीखे तो कामनवेल्थ गेम के दौरान आने वाले हजारों विदेशी मेहमानों के सामने देश व दिल्ली की छवि पर बट्टा लगेगा। यह ठीक है कि यहां का आम शहरी शैक्षिक व सामाजिक रूप से जितना सभ्य हो रहा है, व्यवहारिक रूप से उतना ही असभ्य हो रहा है, खासकर सिविक सेंस के प्रति तो मात्रा 5 से 10 प्रतिशत शहरी ही गंभीर होंगे। सामाजिक ढांचा ही इस तरह का खड़ा हो गया है कि इस ढांचे का हर प्राणी, चाहे वह नौकरशाह हो या मजदूर, चाहे वह राजनीतिज्ञ हो या व्यापारी,उद्यमी, क्लर्क हो या अफसर, डाक्टर हो या मरीज सभी तो कदम कदम पर अपनी असभ्यता को प्रकट कर ही देते है तभी तो अब दिल्ली वासियों को एटीकेट व एटीटयूड सिखाने की बात की जा रही है। यह हमारी आदत हो गई है कि जिस काम के लिए हमें मना किया जायेगा, उसे करने में हमें गौरव हासिल होता है। जहां लिखा होगा थूकना मना है, हम वहीं थूकेंगे, सड़कों पर नो पार्किंग के बोर्ड लगे होंगे और हम उनके सामने ही अपना वाहन पार्क करेंगे। सड़कें, ट्रेन, बस, रिक्शा, टैक्सी, आटो, अस्पताल, हैल्थ केयर सेंटर, खेल मैदान, होटल, रेस्टोरेंट, क्लब, स्कूल कालेज हर जगह हम खुद इस तरह की अस्भ्यता के शिकार भी होते हैं और इस तरह की असभ्यता प्रदर्शित भी करते हैं। दिल्ली में सिविक समस्याएं बढ़ रही हैं तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है, इसके लिए दोषी कौन यह एक ऐसा सवाल है कि पहले मुर्गी या पहले अंडा। जवाब सीधा और सरल है वह यह कि आम जनता हो या सरकार में बैठे लोग सभी की सिविक समझदारी, सकारात्मक सोच तथा समाज, शहर व व्यक्तियों के लिए जिम्मेदारी कम हो रही है।


    क्या कहते हैं चिदंबरम
  • कामनवेल्थ गेम के दौरान बाहर से आने वाले मेहमानों पर अपने व्यवहार से अच्छा प्रभाव डालने के लिए दिल्ली के लोगों को अपनी बुरी आदतें बदलनी होंगी, तभी हम उन्हें प्रभावित कर सकते है। देश भर से लोग दिल्ली आते हैं, हम उन्हें दिल्ली आने से रोक नहीं सकते लेकिन अगर वह दिल्ली आते हैं तो उन्हें दिल्ली के प्रति खुद को व्यवहारिक बनाना होगा। दिल्ली के लोगों को एक बड़े अन्तर्राष्ट्रीय शहर के नागरिकों की तरह व्यवहार करना चाहिए।
  • मजबूरी भी है नगरीय तहजीब का उल्लंघन

  • दिल्ली की जनता को विश्व स्तरीय नगरीय जीवन की तहजीब सिखाने की कवायद पर तो बहस हो रही हैै लेकिन जो लोग नगरीय जीवन की तहजीब में स्वयं को बांधे रखना चाहते हैं उनके सामने भी तहजीब के इस दायरे को तोड़ने की कई मजबूरियां है। यह वह वर्ग है जो तहजीब सीखने से पहले अपनी मजबूरियों का हल चाहता है। दरअसल ऊंची इमारतों व आकर्षक फ्लाईओवरों ने भले ही दिल्ली के चेहरे को चमकदार बना दिया हो लेकिन जिस तरह पिछले पांच दशक में दिल्ली का बेढंगा विकास हुआ है उसने एैसी बदरंग दिल्ली बनाई है कि इसमें रंग भरने में लंबा समय लगेगा। जिस राजधानी में लगभग 1600 अनाधिकृत कालोनियां हों और हजारों झुग्गी झौपड़ियां व कलस्टर हों उस दिल्ली के आम नागरिक को नगरीय जीवन की तहजीब होगी इसकी कल्पना करना भी निरर्थक है। अनाधिकृत कालोनियांे का दौरा करने पर पता चलता है कि वर्षो से वहां कोई कूड़ेदान सरकारी स्तर पर नहीं है। सड़क या नाले नालियां ही उनके कूड़ेदान है, नतीजतन सड़कों पर कूड़ा डालना उनकी आदत हो गई है। पेयजल लाइन न होने के कारण जल निगम की पाइप लाइन को बीच में काटकर अपनी प्यास बुझाना उनकी मजबूरी है चाहे इसके बदले काटे गये स्थान से महीनों तक पानी बेकार बहता रहे क्योंकि उनके सरोकार पानी की बरबादी से ज्यादा अपनी प्यास से जुड़े हैं। जिन क्षेत्रों में वर्षो से कोई स्कूल तक नहीं है उस क्षेत्रा के बच्चों से एटीकेट व एटीटयूट की उम्मीद कैसे की जा सकती है, आखिर एैसे क्षेत्रों के बच्चों की एक पीढ़ी अब नयी पीढ़ी को जन्म दे रही है। आज इन क्षेत्रों से जन्म लेने वाली नई पीढ़ी पर नगरीय जीवन की तहजीब बिगाड़ने का आरोप भले ही लगाया जाये लेकिन असली गुनाहगार तो वह लोग हैं जिन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थो के लिए इस पौध को खड़ा किया है।
  • कहीं अहम तो कहीं गर्वानुभूति कराती है तहजीब का उल्लंघन

  • सिविक सेंस यानि नगरीय तहजीब को तोड़ने में कहीं व्यक्ति का अहम प्रमुख भूमिका निभाता है तो कहीं नियम तोड़ने में होने वाली गर्वानुभूति इसका कारण बनती है। दिल्ली की कथित हाई क्लास सोसायटी के लोगों में एक बड़ा वर्ग एैसा है जो नियमों का उल्लंघन करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। हाई क्लास सोसायटी के लोगों की पहुंच भी ऊंची होती है और उनके भीतर खुद को औरों से अलग दिखने की इच्छा भी हिलौरें लेती है। ऊंची पहुंच का फायदा उठाकर ही वह नियम तोड़ते हैं और यह उनकी आदत बन जाती है। यातायात पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बातचीत में यह स्वीकार किया कि दिन भर उनके कार्यालय में सैंकड़ों फोन ऊंची पहंुच व ऊंचे रसूख वाले लोगों के मात्रा इसलिए आते हैं क्योंकि बीच सड़क में यातायात पुलिस ने उन्हें नियम के उल्लंघन मे ंपकड़ लिया है। चालान से बचने और संबधित यातायात पुलिसकर्मी को अपना रसूख दिखाने के लिए वह तत्काल फोन घूमाते है। इनमें एक बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की भी होती है जो सीधे सीधे यातायात पुलिसकर्मी को उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी तक दे देते है। बड़े घरों के रईसजादे जब बाईक लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो बाइक की रफ्तार, बीच सड़क में स्टंट और रेड लाइट जंप करना उनके लिए आम बात होती है। विडंबना तो यह है कि पकड़े जाने पर उन्हें चालान का भी कोई भय नहीं होता और यातायात पुलिस कर्मी के पहुंचने से पहले ही वह अपनी जेब से चालान के जुर्माने की राशि हाथ मे लेकर लहराने लगते हैं। दक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में अक्सर इस तरह के बाइक सवारों को देखा जा सकता है जो जानबूझ कर नियमों का उल्लंघन करते हैं। एैसा कर उन्हें गर्व की अनुभूति होती है।
  • सजा कम होना भी है एक बड़ा कारण

  • राजधानी के लोगों में सिविक सेंस न होने का एक बड़ा कारण नियम तोड़ने या नगरीय तहजीब का उल्लंघन करने पर सजा कम होना भी है। या तो इनफोर्समेंट एजेंसियां काम ही नहीं करती, यदि काम भी करती हैं तो सजा इतनी कम होती है कि उसका कुछ प्रभाव नहीं होता। कुछ समय पहले ही सार्वजनिक स्थानों पर धु्रमपान पर रोक लगा दी गई थी, जिसे लेकर मीडिया ने भी काफी प्रचार किया था लेकिन आज स्थिति यह है कि इस कानून के कोई मायने नहीं है। यातायात नियमों के उल्लंघन के मामले में पुलिस कुछ कठोर जरूर है लेकिन वहां चालान की राशि इतनी कम है कि चालान का कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह सड़कों के किनारे खड़े होकर लघु शंका करने जैसी हरकतें हों या फिर सड़कों पर पैदल चलने की तहजीब, इन मुद्दों को न तो यह सब करने वाले गंभीरता से लेते हैं और न ही शासन की सिविक एजेंसियां गंभीरता से लेती हैं। दिल्ली को साफ रखने की बात तो की जाती है लेकिन सड़कांें पर चलते समय थूकना, फास्ट फूड के खाली रैपर फंैंकना, कोल्ड ड्रिंक के खाली टीन के छोटे ड्रम फेंकना आम बात है। पार्को की स्थिति तो इससे भी दयनीय है, लोग पार्क में घूमने जाते हैं और गंदगी फैलाकर वापस लौटते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें सबक सिखाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाती। दीवारों पर पोस्टर प्रतिबंधित करने के लिए नया डिफेसमेंट एक्ट बना लेकिन पोस्टर लगाने, दीवारे पोतने के आरोप में कभी किसी को बड़ी सजा की खबर सुनाई नहीं दी, ऐसे में एैसे कानून का औचित्य ही लोगों की नजर में नहीं रहता। कानून का उल्लंघन करने वाले भी इस बात को जानते हैं कि उन्हें सजा मिलना तो दूर उनकी इस गलती को गंभीरता से भी कोई नहीं लेगा। मेट्रो स्टेशनों पर मेट्रो में सवार होने की तहजीब सिखाने के लिए डीएमआरसी प्रशासन लगातार न केवल स्टेशनों पर फिल्मों का प्रदर्शन कर रहा है बल्कि प्रमुख स्टेशनों पर गार्ड भी तैनात किये गये हैं बावजूद इसके जब ट्रेन आती है तो ट्रेन से उतरने वाले यात्रियों व सवार होने वाले यात्रियों में गुत्थमगुत्था रोजाना होती है और इस दौरान महिलाओं को तो अक्सर छेड़छाड़ का शिकार भी होना पड़ता है लेकिन बावजूद इसके एैसी गुत्थमगुत्था करने वालों पर कोई बड़ा जुर्माना कभी नहीं हुआ। यह स्थिति सभी विभागों से संबधित नियमों के उल्लंघन पर लागू हो रही है और विभागों के अधिकारी स्वयं ऐसे नियमों का उल्लंघन करते देखे जाते हैं।
  • स्कूलों में नहीं है नगरीय तहजीब सिखाने का पाठयक्रम

  • आम जनता को नगरीय तहजीब सिखाने की बातें तो अक्सर की जाती हैं लेकिन इसमें सबसे बड़ी खामी हमारी शिक्षा व्यवस्था में इस तरह का कोई पाठयक्रम न होना भी है। स्कूलों में शैक्षिक विकास पर तो बल दिया जाता है लेकिन दैनिक जीवन व नगर से जुड़ी जरूरी बातों को अक्सर उपेक्षित रखा जाता है। राजधानी दिल्ली को अब विश्वस्तरीय नगर बनाने की बात की जा रही है और विश्व के अन्य देशों से इसकी तुलना भी की जाने लगी है नतीजतन इस तुलना में दिल्ली अन्य देशों के नगरों से पीछे दिखाई देती है, इसका प्रमुख कारण वहां के लोगों की नगरीय तहजीब यानि सिविक सेंस है। दरअसल विदेशियों में इस तरह की सिविक सेंस का एक बड़ा कारण उनकी शिक्षा व्यवस्था है। वहां के किसी छोटे स्कूल का छात्रा भी इस तहजीब में बंधा दिखाई देता है क्योंकि स्कूल में शिक्षा के साथ साथ आम नागरिक जीवन के पहलुओं को भी सिखाया पढ़ाया जाता है। राजधानी में शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि शिक्षा व्यवस्था भी सरकार और एमसीडी में बंटी है और पाठयक्रम इन दोनों का ही नहीं है। यहां के स्कूलों में सीबीएसई पाठयक्रम लागू है, निजी स्कूलों में भी अधिकतर स्कूलों में सीबीएसई पाठयक्रम लागू है, सीबीएसई के स्तर पर भी अपने पाठयक्रम में सिविक सेंस से जुड़ी शिक्षा देने की कोई गंभीर पहल कभी नहीं हुई है। सरकार और निगम तो अपने स्कूलों के प्रति आंखे मूंदे रहते ही हैं, जबकि निजी स्कूलों का आलम यह है कि उनकी निगाहें पाठयक्रम से ज्यादा स्कूल की छवि व उसके परीक्षा परिणाम पर ज्यादा होती हैं नतीजतन नागरिक जीवन से जुड़े पहलू अनछुए रह जाते हैं।

शहरी विकास मंत्राी डा.ए.के.वालिया से बातचीत

लोग दिल्ली को समझें अपना घर: वालिया

कामनवेल्थ गेम के मद्देनजर दिल्ली वालों को एटीकेट सिखाने व उनका एटीटयूट सुधारने की भी बात की जा रही है क्या दिल्ली वालों का एटीटयूट ठीक नहीं ?
कामनवेल्थ गेम देश के स्वाभिमान व सम्मान से जुड़े हैं, आखिर यह देश का मामला है, विदेशी मेहमानों के साथ कोई छेड़छाड़, अभद्र व्यवहार जैसी घटनाएं होंगी तो इसका गलत प्रभाव पड़ेगा। जहां जहां भी खेल होते हैं वहां विदेशी मेहमानों की सहायता के लिए स्वयसेवकों की फौज बनाई जाती है, यहां भी एैसी फोज तैयार हो तथा आम जनता को भी शिक्षित करना होगा।

लोगों को शिक्षित करने के जो प्रयास हो रहे हैं क्या वह काफी हैं ?
युद्ध स्तर पर काम करना होगा। हम खेल से जुड़ी परियोजनाओं पर तो बल दे रहे हैं लेकिन इस तरफ अभी ध्यान नहीं दिया गया है। अब समय आ गया है कि लोगों को शिक्षित करें ताकि खेलों के दौरान विदेशी मेहमानों के सामने दिल्ली व देश की बेहतर छवि प्रस्तुत हो।

दिल्ली की जनता में एटीटयूट व एटीकेट की कमी का क्या कारण है?

दिल्ली का विकास योजनाबद्ध नहीं हुआ है और यहां की आबादी में भी बड़ी आबादी माइग्रेटिड है। बाहर से लोग आते हैं और जहां जगह मिलती है वहां बसेरा बना लेते हैं। न तो मूलभूत सुविधाएं वहां तक पहुंच पाती हैं और न ही शिक्षा। सरकार अब प्रयास कर रही है, जेजे कलस्टर निवासियों को फ्लैट दिये जा रहे हैं ताकि उनके रहन सहन का स्तर ऊंचा हो, अनाधिकृत कालोनियों को भी नियमित कर वहां सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। जनसंख्या का दबाव भी एक बडी समया है।

ेकामनवेल्थ गेम को देखते हुए दिल्ली के लोगों की सिविक सेंस को आप किस रूप में देखते है ?
सिविक सेंस एक बड़ी समस्या है, इसे निश्चित रूप से सुधारना होगा, इसके लिए नये नियम व कानून भी बनाये जाने की जरूरत है। विदेशों में यदि सिविक सेंस है तो वहां भी धीरे धीरे सुधार हुआ है, वहां नियम तोड़ने पर सजा का प्रावधान भी कड़ा है। सजा के दबाव से भी जागरुकता उत्पन्न होती है।

कड़े नियम कानून बनाने की दिशा में सरकार ने क्या किया है ?
सरकार ने अपनी तरफ से पहल की है। जगह जगह दीवारों पर पोस्टर आदि रोकने के लिए अपना डिफेंसमेंट एक्ट बनाकर कड़ी सजा के प्रावधान किये। अब अपना आबकारी एक्ट बनकर तैयार है जिसमें सड़कों के किनारे शराब का सेवन करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है।

दो एक्ट बना देने से कितनी सफलता मिल सकती है ?
सरकार के हाथ बंधे हैं, एमसीडी एक्ट में भी बड़े संशोधन की जरूरत है, लेकिन दिल्ली सरकार के अधीन एमसीडी न होने के कारण सरकार कुछ कर सकने में सक्षम नहीं है। हम कानून नहीं बना सकतंे। छोटे छोटे काम के लिए भी केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व गृह मंत्रालय में जाना पड़ता है और बहुत धीमी गति से काम आगे बढ़ते है। निश्चित रूप से काफी सुधार की जरूरत है।

जनता में क्या खामियां देख रहे हैं ?
इसे खामियां नही कहेंगे, जागरुकता की कमी कहेंगे। लोग अपने घर का कूड़ा सड़क पर डालते हैं या फिर नाले में डाल देते हैं जिससे सड़को ंपर गंदगी होती है, नाले व सीवर लाइन जाम हो जाती हैं और फिर उन्हीं लोगों को समस्या होती है, यही उन्हें समझना होगा। जनता को समझना होगा कि दिल्ली उनकी अपनी है, और अपनी दिल्ली को साफ सुथरा उन्हें रखना है, जनता को समझना होगा कि यहां की सम्पत्ति उनकी अपनी सम्पत्ति है जिसे नुकसान न पहुचंाया जाये। लोग दिल्ली को अपना घर समझें और जिस तरह अपने घर को रखते है उसी तरह दिल्ली को सहेज कर रखें।

जनता को जागरुक करने के लिए सरकारी स्तर पर क्या प्रयास किये गये हैं ?
सरकार समय समय पर जागरुकता अभियान चलाती रही है। होली पर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने का अभियान छेड़ा गया तो दीपावली पर पटाखों से प्रदूषण न फैलाने के अभियान चलाये जो काफी सफल रहे।
सिविक सेंस से संबधित दिल्ली की बड़ी समस्या आप क्या देखते हैं ?
सबसे बड़ी समस्या सेनीटेशन और जलभराव की है, इसका कारण यही है कि लोग अपने घर का कूडा कूड़ेदार में डालने के प्रति जागरूक नहीं। कूड़ा नालियों में फंसने के कारण ही जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है। दूसरी बड़ी समस्या प्रदूषण है जिसके लिए सरकार ने लगातार गंभीर पहल कर सभी सार्वजनिक वाहनों को सीएनजी में परिवर्तित किया है और प्रदूषण कम करने के अभियान चलाये हैं।

बिजली व पानी की फिजूल खर्जी भी एक बड़ी समस्या है क्योंकि दिल्ली की बढ़ती आबादी के लिए यूं भी बिजली पानी की कमी महसूस की जा रही है, इस पर क्या कहेंगे ?
बिजली पानी की फिजूलखर्जी एक बड़ी समस्या है लेकिन इससे बड़ी समस्या बिजली चोरी व लीकेज के कारण बेकार होने वाला पानी है। इसे रोकने की जरूरत है।

मौत के कारागार

एक्सरे : मौत बांटती जेल

ये मौत के कारागार हैं, जहां एक हजार से अधिक लोग हर साल मौत के मूंह में चले जाते हैं। कारागार की तंग कोठरियो में आजाद होने का सपना संजोने वाले बंदियों को आजादी भले न मिले लेकिन जलालत, शोषण, उत्पीड़न और मौत जरूर मिल जाती है। गाजियाबाद की डासना जेल में रहस्यमय मौत का शिकार हुए आशुतोष अस्थाना की मौत ने एक बार फिर उन सवालों को खड़ा कर दिया है जो सवाल जेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार व खुंखार अपराधियों के वर्चस्व की कहानी बयां करते हैं। जेलों में सुधार की बात तो की जाती है और तकरीबन हर जगह बंदी सुधार के लिए तरह तरह के कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं लेकिन आये दिन जब जेलों के भीतर कैदियों के आपसी संघर्ष, हत्याओं व रहस्यमय मौतों के किस्से सामने आते हैं तो जेलों को सुधार गृह बनाने की कवायद दम तोड़ती दिखाई देती है। जेलों के भीतर होने वाले कारनामों को लेकर जेल अधिकारियों के माथे पर बार बार कलंक लगता रहा है ओर हर कलंक को किसी न किसी मजिस्ट्रेटी जांच से धो दिया जाता है। जेलों में मौत के आंकड़े जेलों की बदहाली की कहानी कहते हैं। हालांकि जेलों में मौतों को लेकर कोई ताजा आंकड़े नहीं है लेकिन पिछले वर्ष एक स्वयं सेवी संगठन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से प्राप्त आंकड़ों को सार्वजनिक करते हुए दावा किया था कि पांच वर्षो के दौरान 7468 लोगों की भारतीय जेलों में या पुलिस हिरासत में मृत्यु हुई है। एक अनुमान के अनुसार देश में कहीं न कहीं औसतन चार लोगों की मौत प्रतिदिन जेल में या पुलिस हिरासत में हो जाती है। जेलों में जितनी भी मृत्यु होती हैं, उनकी जांच की जाती है और अधिकतर मामलों में जांच रिपोर्ट या तो सार्वजनिक ही नहीं होती, और यदि होती भी है तो उसमें बंदी की मृत्यु को स्वाभाविक मृत्यु मान लिया जाता है। बहुत कम मामले एैसे हैं जबकि जांच के बाद किसी बंदी की मृत्यु को लेकर जेल कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। यह ठीक है कि जेल के भीतर सजायाफ्ता कैदियों की बीमारी के कारण स्वाभाविक मौतें भी होती हैं लेकिन एैसी मौतों के लिए भी जेल प्रशासन की लापरवाही को माफ नहीं किया जा सकता। यह जग जाहिर है कि जेल में आम कैदियों को किस तरह का उपचार मिलता है। सुरक्षा व सुधारों की दृष्टि से देश में राजधानी की तिहाड़ जेल प्रमुख जेलों में है। इस जेल में इस वर्ष अक्टूबर तक 14 लोग मौत का शिकार हुए हैं, जेल रिकार्ड के अनुसार इन सभी की मौत बीमारी के कारण हुई है तथा आधे से अधिक कैदियों की मौत उपचार के दौरान जेल से बाहर के अस्पतालों में हुई है। इसी तरह गत वर्ष तिहाड़ जेल में कुल 13 कैदी मौत का शिकार हुए थे, जेल प्रशासन के अनुसार इनकी मौत भी बीमारी के कारण हुई।

विवादित रहा है डासना जेल का इतिहास

गाजियाबाद की डासना जेल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। वर्ष 1997 से अब तक 93 लोग डासना जेल में मौत का शिकार हुए हैं इस वर्ष भी अब तक 9 लोग यहां मौत के मूंह में जा चुके हैं ओर जेल प्रशासन के पास सभी मौतों के लिए एक ही रटा रटाया जवाब है कि इन बंदियों की मौत बीमारियों के कारण स्वाभाविक रूप से हुई है। बहुचर्चित पीएफ घोटाले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी आशुतोष अस्थाना की जेल में हुई रहस्यमय मौत से गाजियाबाद की डासना जेल एक बार फिर चर्चा में है। डासना जेल हमेशा ही विवादों के घेरे में रही है, कभी यह जेल फ्रन्टीयर मेल बम कांड के आरोपी शकील की मौत को लेकर कलंकित हुई तो कभी कविता चैधरी हत्याकांड के आरोपी अरविंद प्रधान की मौत को लेकर कलंकित हुई। इसके अलावा भी दर्जनों एैसी मौतों के मामले हैं जिन्हें लेकर जेल प्रशासन पर उंगली उठती रही है। फ्रन्टीयर मेल बम कांड के आरोपी शकील का शव जेल में एक खिड़की से लटका पाया गया था। जेल प्रशासन के अनुसार शकील ने अपनी ही शर्ट से फांसी लगाकर आत्महत्या की थी लेकिन जिस तरह उसका शव मिला उससे आत्महत्या की कहानी जेल प्रशासन की अपनी बनाई कहानी दिखाई दे रही थी। इसी कविता चैधरी हत्या कांड के मुख्य आरोपी अरविंद प्रधान की हत्या भी रहस्यमय परिस्थितियों में हुई। प्रधान की हत्या के बाद जो बातें जेल के भीतर से छन कर बाहर निकली थी उन पर यकीन किया जाये तो पता चलता है कि अरविंद प्रधान की हत्या की गई थी और उसे मारने के लिए खाने में कांच पीसकर खिलाया गया था। पिछले कुछ वर्षो में यहां लगभग एक दर्जन मौतें इसी तरह रहस्यमय परिस्थ्तिियों में हुई है। इनमें कमरुदद्ीन, इकबाल सिंह, जी।जी.हसन, नूर हसन, गुरुजन सिंह व ठाकुर सिंह एैसे नाम हैं जो जेल प्रशासन की पोल खोलने के लिए काफी है। डासना जेल में पिछले तीन वर्षो में होने वाली मौतों का आंकड़ा देखें तो पता चलता है कि वर्ष 2006 में यहां आठ लोग मौत का शिकार हुए जबकि वर्ष 2007 में 9 लोग मौत का शिकार हुए और वर्ष 2008 में 4 लोग मौत का शिकार हुए। जेल प्रशासन के अनुसार यह सभी मौतें बीमारी के कारण या अन्य कारणों से हुई स्वाभाविक मौतें थी।

आखिर क्या है अस्थाना की मौत का सच

गाजियाबाद की डासना जेल में बंद 23 करोड़ के पीएफ घोटाले के आरोपी आशुतोष अस्थाना की मौत का सच दबाने की तमाम कोशिशों के बावजूद जेल प्रशासन की लापरवाही सच बयां कर रही है। जेल प्रशासन के लिए भले ही वह आम कैदी हो लेकिन एक प्रमुख घोटालें में तीन दर्जन जजों का नाम लेने वाला कैदी वास्तव में आम कैदी नहीं बल्कि खास कैदी था । आखिर अस्थाना के बयानों पर ही न्यायपालिका की भी साख टिकी थी। उसकी मौत पर जेल प्रशासन भले ही खुद को पाक साफ बता रहा हो लेकिन जिस कैदी की जान को खतरा हो और वह जेल प्रशासन व एसएसपी से भी बचाव की गुहार कर चुका हो, उसकी सुरक्षा में लापरवाही क्यों बरती गई। इसका कोई जवाब जेल प्रशासन के पास नहीं है। डासना जेल में बंद आशुतोष अस्थाना एक हाईप्रोफाइल केस का आरोपी थी और उसे अपनी हत्या की आशंका भी थी। डासना जेल के पुराने इतिहास को देखते हुए अब यह संदेह होना लाजिमी है कि उसकी मौत स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि हत्या थी। गाजियाबाद में हुए करोड़ो के पीएफ घोटाले के आरोपी आशुतोष ने इस मामले में 36 जजों के शामिल होने का बयान दिया था, उनके इस बयान के बाद पूरी न्यायपालिका में न केवल हड़कंप मचा था बल्कि न्यायपालिका की साख पर भी संकट दिखाई दे रहा था, ऐसे में उसकी हत्या की आशंका स्वाभाविक है क्योंकि उसी के बयानों पर कई प्रमुख लोगों का भविष्य व साख टिकी थी। तभी तो स्वयं आशुतोष को अपनी हत्या का डर सता रहा था और वह लगातार अपने इस डर से जेल प्रशासन को भी अवगत करा रहा था। अस्थाना द्वारा बार बार चेताये जाने के बावजूद जेल प्रशासन ने जेल में न तो आशुतोष को उच्च सुरक्षा वार्ड में रखा गया और न उसकी देखभाल की कोई व्यवस्था की। आखिर जेल प्रशासन का रवैया इतना लापरवाहीपूर्ण क्यों रहा, यह एक बड़ा सवाल है। यह लापरवाही तब भी जारी रही जब गत 6 फरवरी को कैदियों ने उस पर हमला किया था। अस्थाना ही नहीं बल्कि अस्थाना का परिवार भी लगातार कोर्ट और पुलिस में से इस बात की शिकायत कर रहा था कि उसे मार दिया जायेगा। आशुतोष अस्थाना ने अपने वकील के जरिए 15 फरवरी 2009 को गाजियाबाद कोर्ट को पत्र लिखकर बताया था कि 6 फरवरी को अदालत में लाने के बाद कैदियों ने उसपर हमला किया था। बाद में 7 मार्च को उसने कोर्ट के साथ-साथ एसएसपी गाजियाबाद को भी जान से खतरे की बात बताई। प्रदेश के आईजी जेल स्वयं यह मान चुके हैं कि अस्थाना को जेल में खतरा था तथा कुछ कैदियों ने उसकी पिटाई भी की थी। जेल सूत्रा बताते हैं कि उसकी एक बार नहीं बल्कि दो बार कैदियों ने पिटाई की और वह अपने साथी कैदियों से भी अपनी हत्या की आशंका व्यक्त करता था। बावजूद इसके जेल प्रशासन ने उसे जेल में सुरक्षा प्रदान नहीं की जिसका नतीजा वही हुआ जो इससे पूर्व कविता चैधरी हत्या कांड के आरीपी अरविंद प्रधान के साथ हुआ। अस्थाना रहस्यमय मौत का शिकार हो गया। उसकी मौत के रहस्य से पर्दा भले ही न उठ पाये लेकिन परिस्थितियां इस बात का गवाह है कि उसकी मौत सामान्य मौत नहीं थी।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

यहां आसानी से पूरी होती है समलैगिक साथी की तलाश

लगभग दो दर्जन स्थान हैं समलैगिकों के अड्डे

  • क्लबों, बार, रेस्टोरेंट व डिस्कोथेक में होती है साप्ताहिक पार्टियां
    पिछले 10 वर्ष से लगातार बढ़ रही है समलैंगिक प्रवृति
    पिछले छह वर्ष में बढ़ा है समलैंगिकता का चलन
    समलैगिकों में 16 से 30 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की संख्या अधिक
    दक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में होती हैं साप्ताहिक पार्टियों का चलन
    इंटरनेट के जरिए ढूंढते हैं पसंद के साथी
    स्कूल व कालेज व हास्टल में रहने वाले छात्रा छात्राओं में भी बढ़ रही है यह प्रवृति
    अप्राकृतिक संबधों को गलत नहीं मानते समलैंगिक

नई दिल्ली। उनके लिए प्यार का अहसास भी अलग है और यौन संतुष्टि की परिभाषा भी अलग है। समलिंगी साथी के आकर्षण का सामीप्य ही उन्हें चरम सुख प्रदान करता है तभी तो चढ़ती उम्र में वह एक ऐसी हमराही की तलाश करते हैं जो तलाश उन्हें आम आदमी से कुछ अलग करती है। इंटरनेट पर फ्रेन्डशिप साइटें न केवल इनकी तलाश को पूरा कर रही है बल्कि एक एक कर अब यह वर्ग क्लबों के रूप में भी संगठित हो रहा है। इन क्लबों में मनपसंद साथी तो मिलता ही है साथ साथ ऐसा सकून भी जो इनके लिए तमाम सुखों से ऊपर है। इनके लिए इनके संबध न तो अप्राकृतिक हैं और न ही सामाजिक मर्यादा के खिलाफ हैं। समलैंिगकता के विरोधी भले ही इसे मानसिक विकृति कहें लेकिन समलैंिगक संबधों पर उन्हें गर्व है। राजधानी के उच्च वर्ग व उच्च मध्यम वर्ग के अलावा स्कूल कालेजों में समलिंगी संस्कृति दिन प्रतिदिन फल फूल रही है। इंटरनेट पर सैंकड़ों ऐसी साइटें हैं जो इन्हें अपना मनपसंद साथी खोजने में मदद करती हैं, यही नहीं दक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में समलैंगिक वर्ग ने अपने समूह, संगठन व क्लब भी बना लिए है और किसी निश्चित स्थान पर नियमित रूप से एकत्रा होकर न केवल यह मौज मस्ती करते हैं बल्कि समलैंिगक रिश्तों पर खुल कर परिचर्चा भी करते हैं। जानकारी के अनुसार राजधानी में लगभग दो दर्जन ऐसे स्थान हैं जहां यह लोग नियमित रूप से मिलते हैं। पिछले दस वर्ष में राजधानी में समलिंगी संस्कृति ज्यादा विकसित हुई है। समलैगिकों को लामबंद करने में इस दिशा में कार्य कर रहे स्वैच्छिक संगठन नाज फाउण्डेशन तथा वाॅइस अगेन्सट 377 ने भी प्रमुख भूमिका निभाई है। एक अन्य संस्था हमराही भी पिछले लंबे समय से समलैगिंकों के लिए कार्य करती रही है। इंटरनेट की फ्रेन्डशिप साइटों, फेसबुक, ओरकुट, हाई 5, टैग्ड, व्यान आदि में जहां ें समलैंिगक साथी को आसानी से खोजा जा सकता है वहीं कुछ वेबसाइटें भी समलैंगिकों को उनका मनपसंद साथी खोजने में मदद करती है। कुछ साइटों में तो समलैगिंकों के लिए अलग चैटिंग रूम भी उपलब्ध है। जानकारी के अनुसार राजधानी में चाणक्य पुरी स्थित एक निश्चित स्थान पर पिछले लगभग पांच वर्ष से समलैगिंक वर्ग द्वारा नियमित रूप से साप्ताहिक पार्टी का आयोजन किया जाता है। रात्रि 9 बजे से शुरु होने वाली यह पार्टी देर रात तक चलती है। काल सेंटरों में कार्यरत युवा, मल्टी नेशनल कंपनियों के एक्जक्यूटिव स्तर के कर्मचारियों के अलावा कुछ स्वैच्छिक संगठनों के कार्यकर्ता भी इन पार्टियों में दिखाई देते हैं। इसके अलावा स्कूल कालेजों के होस्टलों में भी समलैंिगक वर्ग ने अपने छोटे छोटे समूह बना रखे हैं और इन समूहों में वह अक्सर राजधानी के कुछ पार्को में मौज मस्ती के लिए जाते हैं। नेहरु पार्क, पीवीआर साकेत, सेन्ट्रल पार्क, जनकपुरी डिस्ट्रिक पार्क,चिराग दिल्ली, धौलाकुआं, इंडिया गेट, इन्द्रप्रस्थ पार्क व बस अड्डे आदि समलैगिंक युगलों के मनपसंद स्थान है। इसके अलावा पार, पब, रेस्टोरेंट व डिस्कोथेक भी इनके मिलने के अड्डे हैं। समलैगिंकों को अपने संबधों पर न तो कोई पछतावा है और न ही वह शर्मसार हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय के बाद तो वह गौरवान्वित हैं। कानूनी मान्यता मिलने के बाद अब इनकी कोशिश अपने रिश्तों को सामाजिक मान्यता दिलाने की है। समलैगिकों की लड़ाई लड़ रहे वाॅाइस अगेन्सट 377 के सुमित कहते हैं कि कानून से बड़ी चीज सामाजिक मानसिकता है, अब समाज को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी तभी समलैंिगकों के गौरव व आत्मसम्मान में बढोत्तरी होगी।

‘चालू छ भई चालू छ हमरा मजा चालू छ‘

सेक्स हो या प्यार वो नहीं है सामाजिक नियमों के मोहताज
sanjay टुटेजा
नई दिल्ली। समलिंगी रिश्तों पर न तो वह शर्मसार हैं और न ही सामाजिक वर्जनाओं की उन्हें फिक्र है। उनके लिए तो आज का दिन जश्न का दिन है और नई उम्मीदों का दिन है । मानों उनके सपने साकार हो गये। समाज गाली देता है तो दे कम से कम कानून का तो सहारा मिल गया, शायद यही उनकी सबसे बड़ी जीत है। आपसी रिश्तों को लेकर सामाजिक नियम जो भी हों लेकिन सेक्स हो या प्यार, इस बारे में वह सामाजिक नियमों के मोहताज नहीं है। विपरीत सेक्स का आकर्षण उनके लिए बेमानी है तभी तो अपने भविष्य के सपने भी वह अपनी समलिंगी साथी की आंखों में देखते हैं। इस रिश्ते के बारे में पूछने पर वह यही बोलते है ‘चालू छ भई चालू छ हमरा मजा चालू छ’। समलेंगिक रिश्तों को लेकर आज खामोश रहने वाले लबों पर भी प्यार के तराने थे। आखों में मस्ती थी और चेहरों पर एक नई चमक। हाईकोर्ट के फैसले के बाद आज जब समलिंगियों के जोड़े प्यार के गीतों मे डूब कर राजधानी की सड़कों पर उतरे तो उनकी आंखों में न तो कोई शर्म थी और न ही उन्हें समाज का कोई डर था। मानों उनका रोम रोम रोमांचित था। हर ओर से बस यही आवाज उठ रही थी ‘देता है दिल दे, बदले में दिल के, न मांगू मैं सोना चांदी, न मांगू मैं हीरा मोती, ये मेरे किस काम के‘। अब तक अपने रिश्तों पर खुल कर बोलने से भी हिचकिचाने वाले समलिंगी जोड़ों की आंखें भी यही गीत गा रही थी ‘आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’। जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में बीए की छात्रा जूही आज अपनी समलिंगी साथी कल्पना के साथ यह जश्न मनाने पहुंची। जूही का कहना था कि समाज तो किसी लड़के व लड़की के प्यार को भी मान्यता नहीं देता, फिर वह समाज की क्यों फिक्र करें। अब एक साथ जीने मरने की जो कसमें जो उन्होंने खाई हैं कम से कम अब कोई कानूनी रोड़ा इन कसमों को पूरा करने में नहीं आयेगा। उसकी साथी कल्पना ने भी जूही के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा हां, अब उन्हें एक साथ रहने से कोई नहीं रोक सकेगा। जूही और कल्पना ने जहां बेबाकी से दिल की बात कहीं वहीं सादिक और उपेन्द्र, नेहा और भारती, तथा अशोक और प्रियेश अपने दिल की बात कहने में शर्मा गये लेकिन उनकी आंखों ने उनकी दिल की बात बयां कर दी। कनाट प्लेस में ही एक फर्म में काम करने वाली अनुप्रीति भी अपनी एक महिला साथी के साथ वहां मौजूद थी, उनसे उनके रिश्ते के बारे में पूछा तो वहा मुस्कुरा कर गाने लगी ‘ चालू छ भई चालू छ हमरा मजा चालू छ’।

बुधवार, 6 मई 2009

उत्तर पश्चिम: समस्याओं के भंवर में फंसी दो महिलाएं

नई दिल्ली। उत्तर पश्चिम (सु।) लोकसभा सीट समस्याओं का ऐसा भंवर है जिसमें दो सशक्त महिलाएं फंस गई हैं। एक महिला अपने ही घर में परायों से घिरी है तो दूसरी महिला बाहरी होकर वहां अपनी जगह तलाश रही है। एक महिला के पास निष्ठावान कार्यकर्ताओं की फौज ,है तो दूसरी महिला के पास लंबा राजनीतिक अनुभव। एक महिला के पास लोकसत्त्ता के सबसे छोटे सदन का प्रतिनिधित्व है तो दूसरी महिला के पास देश के सर्वोच्च सदन का प्रतिनिधित्व है। एक महिला के सामने अपने ऊंचे सपनों को साकार करने का अवसर है तो दूसरी महिला के सामने अपनी प्रतिष्ठा को बचाये रखने की चुनौती है। इन दोनों ही महिलाओं का लक्ष्य तो एक है लेकिन राह जुदा है। पग पग पर खड़ी समस्याओं के भंवर में फंसी यह दोनों ही महिलाएं अब इस भंवर से निकलने के लिए किसी मजबूत सहारे को तलाश रही हैं। ' उत्तर पश्चिम (सु।) लोकसभा सीट दिल्ली के चुनावी परिदृश्य में नई लोकसभा सीट है। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों में सर्वाधिक मतदाताओं वाली इस सीट पर कुल उम्मीदवारों की संख्या तो 16 है लेकिन मुख्य मुकाबला दो महिलाओं कांग्रेस की सांसद व उम्मीदवार कृष्णा तीरथ तथा भाजपा उम्मीदवार व मौजूदा पार्षद मीरा कांवरिया के बीच है। वैसे एक तीसरी महिला रिपब्लिकन पार्टी की गीता भी चुनाव मैदान में अपनी पहचान बनाने की कशमकश कर रही है। इन महिलाओं में कांग्रेस की कृष्णा तीरथ का ेेकद तो सांसद होने के कारण भले ही ऊंचा है लेकिन बाहरी उम्मीदवार होने के छवि ने यहां उनके कद को छोटा कर दिया है। उत्तर पश्चिमी लोकसभा क्षेत्रा में रहने वाले अधिकतर लोगों की त्रासदी यह है कि आजादी के छह दशक बाद भी यहां लोग सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी आदि मूलभूत समस्याओं से वंचित हैं। इस लोकसभा क्षेत्रा का एक चैथाई क्षेत्रा ग्रामीण है। यहां कुल 97 गांव हैं जिनमें से दो दर्जन गांवों में डाकखाना तक नहीं है और पानी तो दूर कई गांवांे में सड़कें तक नहीं हैं। एक चैथाई क्षेत्रा इस सीट में अनाधिकृत कालोनियों का है, जहां कच्ची गलियां, पेयजल की किल्लत और सीवर लाइन न होना बड़ी समस्या है। एक चैथाई क्षेत्रा पुर्नवास कालोनियों का है, इनकी अपनी समस्याएं हैं, कोई मालिकाना हक के लिए संघर्ष कर रहा है तो कोई अन्य समस्याआंे से जूझ रहा है। रोहिणी सहित लगभग एक चैथाई क्षेत्रा ही ऐसा है जहां कुछ विकास दिखाई देता है, बाकी तीन चैथाई क्षेत्रा में केवल समस्याएं ही दिखाई देती हैं, यह तीन चैथाई क्षेत्रा पानी की बूंद बूंद के लिए तरसता है। यह इस क्षेत्रा की विडंबना ही है कि यहां के दस विधानसभा क्षेत्रों में मात्रा तीन सरकारी अस्पताल हैं और मात्रा एक सरकारी कालेज। बादली में एक सरकारी अस्पताल की नींव पूर्व प्रधानमंत्राी राजीव गांधी सहित ने रखी थी और उसके बाद भी दो बार इस अस्पताल का शिलान्यास हो चुका है लेकिन आज तक यह अस्पताल नहीं बन सका है। ग्रामीण किसानों की मुआवजे की समस्या एक बड़ी समस्या है, लंबे अरसे से किसान नई दरों के अनुसार मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। यह सभी ऐसी समस्याएं हैं जो कांग्रेस की कृष्णा तीरथ के लिए बड़ी समस्या हैं क्योंकि पिछले दस वर्ष से दिल्ली में कांग्रेस का ही शासन है। भाजपा की मीरा कांवरियां के पास खोने को कुछ नहीं है, उनके सामने अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का यह सुनहरा अवसर है। उनका विनम्र स्वभाव और स्वच्छ छवि उनके लिए यहां मददगार हो सकती है।

शनिवार, 2 मई 2009

तपती सड़कों पर हाथी की दौड़ करेगी हार जीत का फैसला

उत्तर पश्चिम, दक्षिण दिल्ली व उत्तर पूर्व में हाथी बना पहेली

सात में तीन सीटों पर बसपा की भूमिका महत्वपूर्ण

बसपा का जातिगत फार्मूला कर सकता है बड़ा फेरबदल

दिल्ली की तपती सड़कों पर हाथी की दौड़ जहां खत्म होगी वहीं से किसी भी प्रत्याशी के संसद पहुंचने का रास्ता शुरु होगा। प्रचण्ड गर्मी में हाथी की दौड़ निश्चित रूप से चुनावी समीकरण को बदलेगी। सात लोकसभा सीटों में तीन सीटों उत्तर पश्चिम, दक्षिणी दिल्ली तथा उत्तर पूर्व में बसपा का मदमस्त हाथी कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए पहेली बन गया है। इन तीनों ही सीटों पर बसपा की अहम भूमिका परिणाम की दिशा तय करेगी। आसमान से आग उगलती गर्मी में राजधानी में चुनावी शोर की गूंज तो पहले जैसी नहीं है अलबत्ता निगम चुनाव में दस्तक के बाद बसपा का हाथी अब हिलौरें लेकर दौड़ने लगा है। हाथी की दौड़ पर न तो मौसम का असर है और न ही कांग्रेस और भाजपा का कोई अंकुश। एैसे में यह दोनों ही दल भयभीत हैं क्योंकि कहीं न कहीं बसपा का हाथी इन दोनों ही दलों को नुकसान पहुंचायेगा। उत्तर पश्चिम, उत्तर पूर्व और दक्षिणी दिल्ली यह तीन लोकसभा सीटें एैसी हैं जहां से बहुजन समाज पार्टी को काफी उम्मीदें हैं। यहां बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी चुनाव भले ही न जीत पायें लेकिन इतना निश्चित है कि इन तीनों सीटों पर किसी भी प्रत्याशी की हार जीत बसपा ही तय करेगी। पिछले निगम चुनाव तथा विधानसभा चुनाव में भी इन तीनों ही सीटों पर बसपा को अन्य सीटों से अधिक सफलता मिली थी। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को सर्वाधिक 24.53 प्रतिशत मत दक्षिणी दिल्ली सीट पर मिले थे और इसी लोकसभा के अन्तर्गत एक विधानसभा सीट पर भी बसपा ने कब्जा किया था। निगम चुनाव में भी इस सीट से तीन वार्डो पर बसपा प्रत्याशी विजयी हुए थे। इस चुनाव में बसपा ने यहां से गुजर प्रत्याशी कंवर सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है जो जातीय दृष्टि से भी बसपा के अनुकूल है क्योंकि दक्षिणी दिल्ली सीट गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रा है, हालांकि यहां पर भाजपा ने भी गुर्जर प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारा है लेकिन यदि बसपा का जातीगत फार्मूला कामयाब हुआ तो इसका नुकसान भाजपा प्रत्याशी को हो सकता है। उत्तर पश्चिम लोकसभा सीट पर बसपा को विधानसभा चुनाव में 16.54 प्रतिशत मत हासिल हुए थे और निगम चुनाव की अपेक्षा बसपा के मतों में 1.68 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई थी। यहां 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति तथा लगभग 20 प्रतिशत ओबीसी मतदाता है इनमें एक बड़ा हिस्सा बसपा का परंपरागत वोट बैंक है, पिछले निगम चुनाव में इसी सीट से बसपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन इसी सीट पर था, यही कारण है कि बसपा ने यहां पर अपनी ताकत लगा दी है, बसपा की मजबूती यहां भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस को नुकसान पहुचा सकती है। उत्तर पूर्व सीट पर पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को 17.67 प्रतिशत मत मिले थे और बसपा के मतों में निगम चुनाव में मिले 13.8 मतों की अपेक्षा 3.87 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और एक विधानसभा सीट पर भी बसपा ने कब्जा किया था। बसपा इस बार इस वृद्धि को बरकरार रखने की कोशिश में हैं। मुस्लिम बाहुल्य इस सीट पर बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी के रूप में हाजी दिलशाद को उतारा है। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या यहां लगभग 22 प्रतिशत है, इसके अलावा ओबीसी व अनुसूचित जाति मतदाताओं की संख्या भी 30 प्रतिशत से अधिक है। बसपा यदि मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण कराने में कामयाब हुई तो यहां कांग्रेस के लिए मुश्किल हो सकती है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

जूते के प्रहार से चिदंबरम नहीं, टाइटलर हुए घायल

टाइलर की उम्मीदवारी पर भारी पड़ सकता है जूता
सीबीआई की क्लीनचिट से बढ़ा आक्रोश
9 अप्रैल के अदालती फैसले पर है निगाहें

नई दिल्ली। गृहमंत्राी पी.चिदंबरम की पत्राकार वार्ता में आज जूता उछाले जाने का चिदंबरम पर तो कोई असर नहीं हुआ है अलबत्ता पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार जगदीश टाईटलर इस जूते के हमले से जरूर घायल हुए हैं। जूते का यह हमला उनकी उम्मीदवारी पर भारी पड़ सकता है। सीबीआई से क्लीनचिट के बाद टाईटलर भले ही वर्ष 84 के इस अध्याय को बंद मान चुके हों लेकिन जूते के हमले ने बोतल के जिन्न को फिर बाहर निकाल दिया है नतीजतन कांग्रेस हैरत में भी है और टाईटलर को बनाये रखने की उलझन में भी। पार्टी आलाकमान की इसी उलझन से टाइटलर की नींद उड़ गई है। अब निगाहें 9 अप्रैल को अदालत के फैसले पर है, यदि अदालत ने सीबीआई की क्लीनचिट को खारिज करते हुए मामले की जांच जारी रखने के आदेश दिये तो कांग्रेस कांग्रेस के लिए भी टाइटलर को उम्मीदवार बनाये रखना मुश्किल होगा।
गृहमंत्राी पी.चिदंबरम की पत्राकार वार्ता के दौरान आज एक सिख पत्राकार जरनैल सिंह ने अपना जूता चिदंबरम की ओर उछाल कर जिस तरह का आक्रोश दिखाया, उससे राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी कांग्रेस के लिए चुनाव की दृष्टि से भी यह जूता बड़ा झटका है। दरअसल अब तक कांग्रेस के दिग्गज भी यही मानकर चल रहे थे कि बीते 25 वर्ष में दिल्ली का आम सिख वर्ष 84 के गम को भुला चुका है और सिख संगत के जख्म भी भर गये हैं लेकिन आज की इस घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि राजधानी के आम सिख के दिल में अभी भी आक्रोश की ज्वाला धहक रही है।
आज जो आक्रोश दिखाई दिया वह सीधे तौर पर चिदंबरम या कांग्रेस के खिलाफ नहीं था। जूता फैंकने से पूर्व पत्राकार ने टाइटलर को क्लीनचिट देने का सवाल ही उठाया था और चिदंबरम के जवाब से असंतुष्ट होकर ही उसने यह कदम उठाया। इससे स्पष्ट है कि टाइटलर को क्लीनचिट दिया जाना सिख संगत के गले नहीं उतर रहा है। हालांकि समय के साथ साथ दिल्ली का सिख समाज 84 के दंश को भुला चुका था लेकिन अब लगता है कि सिख संगत के जख्म फिर से ताजा हो गये है। जगदीश टाइटलर इन दंगों में सिखों के कत्लेआम के प्रमुख आरोपियों में शामिल थे। 25 वर्ष की लंबी जांच के बाद सिख समाज को यह उम्मीद थी कि उन्हें न्याय मिलेगा लेकिन न्याय के बजाय सिख समाज को एक साथ दो नये जख्म मिले, पहला जख्म सीबीआई के निर्णय से पहले ही कांग्रेस द्वारा उन्हें पूर्वी दिल्ली से उम्मीदवार घोषित करना और दूसरा जख्म उन्हें सीबीआई द्वारा क्लीनचिट दिया जाना था।
सीबीआई से क्लीनचिट मिलने के बाद टाइटलर तो इस अध्याय को बंद मान चुके थे लेकिन लगातार उनके विरोध में प्रदर्शन हो रहे है, यहां तक कि सिखों की सर्वोच्च संस्था एसजीपीसी भी दिल्ली के सिखों की आवाज में आवाज मिलाने दिल्ली पहुची। जो आग सिखें के दिलों में सुलग रही थी, जूता उछाले जाने की घटना ने उस आग में घी डालने का काम किया है। इस घटना के बाद जिस तरह संबधित पत्राकार को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया उससे स्पष्ट है कि चुनाव के समय कांग्रेस कोई खतरा लेने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस आलाकमान की ओर ेस इस तरह की खबरे भी आई हैं कि टाइटलर की उम्मीदवारी पर पुर्नविचार होगा। आज देर शाम जिस तरह टाइटलर की सभी रैलियों व बैठकों को रद्द कर दिया गया उससे टाइटलर की उम्मीदवारी निश्चित रूप से खतरे में दिखाई दे रही है। आगामी 9 अप्रैल को इस मामले की निचली कोर्ट में सुनवाई होनी है। अदालत ने यदि सीबीआई की क्लीनचिट को खारिज कर इस मामले की आगे जांच करने के आदेश दिये तो टाइटलर के लिए मुश्किल हो सकती है। राजनैतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि चुनाव से पूर्व केवल टाइटलर के टिकट को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर कांग्रेस आलाकमान सिखों को नाराज नहीं करेगा।

सोमवार, 19 जनवरी 2009

अजनबी को हमराही बनाने की पहल

रोड पर राही, भाई भाई

ताकि सड़कों पर दौड़ती मौत पर लगे लगाम

यह एक जजबा है इंसानियत को जिंदा रखने का और राह चलते हर अजनबी को हमराही बनाने का। तेज रफ्तार सड़कों पर दौड़ती मौत को शिकस्त देने की एक एैसी पहल जो निर्जीव व वीरान सड़कों पर भी अजनबियों के बीच भातृत्व व प्यार का एक रिश्ता कायम कर दे। यही रिश्ता बनाने की एक अनूठी कड़ी है ‘रोड पर राही भाई भाई’। हालांकि सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए यह एक नारा व स्लोगन भर है लेकिन इस पहल ने लाखों वाहन चालकों मंे एैसा जजबा उत्पन्न किया है कि यह नारा अब सरकारी कानून, जुर्माने व सजा के डर से एक कदम आगे दिखाई देता है। इंटरनेट की फ्रेंडशिप वेबसाइटें हों या फिर एमएनसी कंपनियों की कैन्टीन में गपशप की महफिलें हों, रोड पर राही भाई भाई की गूंज यकायक अपनी ओर आकर्षित करती है। सड़कों पर दुर्घटनाएं न हों और प्रत्येक वाहन चालक सड़क पर अपने आस पास चल रहे अन्य वाहन चालकों से भी एक रिश्ता महसूस करते हुए उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर ले, यही इस अभियान की मूल भावना है। इस अभियान के पीछे न तो कोई संस्था है, न स्वैच्छिक संगठन और न ही सरकारी सहयोग, एक गृहणी भारती चड्ढा ने इस अभियान की शुरुआत की और बस सड़कों पर दुर्घटनाओं की रोजमर्रा की तकलीफों से जूझते लाखों लोग स्वयं ही परस्पर जुड़कर इस अभियान का हिस्सा बन गये। अब इस अभियान से जुड़े लोग अपने खर्च से बाकी लोगों को भी प्यार व भाईचारे के इस सफर में सहभागी बना रहे हैं। यातायात पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि बीते एक वर्ष में लगभग 2000 लोग राजधानी में सड़क दुर्घटनाओं में मौत का शिकार हुए और कुल 7485 सड़क दुर्घटनाएं हुई जिनमें 17 हजार से अधिक लोग घायल हुए। तमाम कानून, जुर्माना व सजा का डर तो वाहन चालकों में स्व अनुशासन का जजबा कायम नहीं कर सका लेकिन पांच शब्दों का यह स्लोगन ‘रोड पर राही भाई भाई’ वाहन चालकों पर चमत्कारिक असर डाल रहा है और इस अभियान से जुड़ने वाले लोग इस स्लोगन के प्रति प्रतिबद्ध भी दिखाई दे रहे हैं तभी तो गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष लगभग एक हजार छोटी बड़ी सड़क दुर्घटनाओं की कमी हुई है। इस अभियान से जुड़े लोग दुर्घटनाओं में इस कमी को इस अभियान का परिणाम मानते हैं। भारती चड्ढा के मुताबिक सर्वप्रथम उन्होंने एयरपोर्ट के तमाम टैक्सी चालकों को इस नारे की मूल भावना से जोड़ा उसके बाद तो स्वपरिवर्तन की एक लहर चल निकली। चडढा कहती हैं कि जब सड़क पर चलते समय हम सभी हमराहियों से भाई का रिश्ता कायम करेंगे तो फिर अपने भाईयों की सुरक्षा की प्रतिबद्धता भी कायम होगी। इस अभियान का हिस्सा बन गये अमित के अनुसार उसकी गाड़ी में लगा यह स्टीकर उसे हमेशा यह याद दिलाता है कि सड़क पर साथ चलने वालों की सुरक्षा का वायदा उसने अपने आप से किया है। एक अन्य व्यवसायी विपिन सूरी कहते हैं कि वह दिन दूर नहीं जब सड़क पर निकलने वाले अपने बेटे की सुरक्षा से प्रत्येक मां पूरी तरह निश्चितं होगी । वह कहते हैं कि इस नारे के प्रति प्रतिबद्धता कायम करने से ही हमें सड़कों पर एैसी सुरक्षा मिलेगी।

शनिवार, 20 दिसंबर 2008

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम

बीआरटी बकोटा साउथ कोलंबिया में बने बीआरटी की तर्ज पर बनी राजधानी में बीआरटी बनाने की योजना
विश्व के 30 से अधिक देशों ने अपनाई बीआरटी परियोजना
चीन, इंडोनेशिया व इक्वाडोर में भी शुरु हुई बीआरटी परियोजना
भारत में वर्ष 2002 में बना हाईकैपिसिटी बस काॅरीडोर की योजना का प्रारूप
यह प्रस्ताव तैयार कराने में आईआईटी के परिवहन विशेषज्ञों की रही विशेष भूमिका
अंबेडकरनगर से दिल्ली गेट तक 14.5 किलोमीटर बीआरटी बनाने का हुआ निर्णय
मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने भी की बीआरटी बनाने की संस्तुति
वर्ष 2005 में मिली आर्थिक वित्तीय कमेटी की सहमति
वर्ष 2006 में निर्माण कार्य हुआ शुरु
निर्माण पर कुल लागत लगभग 200 करोड़
प्रति किलोमीटर पर अनुमानित खर्च 15 करोड़
अब तक बन कर तैयार हुआ अंबेडकर नगर से मूलचंद तक 5.6 किलोमीटर
अभी भी लगभग 9 किलोमीटर का निर्माण है अधूरा

2010 तक 7 कोरीडोर को ईएफसी की मंजूरी
मौजुदा कोरीडोर सहित कुल 7 कोरीडोर बनाने की योजना1 अंबेडकरनगर से मूलचंद 14।5 किमी2। राजेन्द्र नगर से प्रगति मैदान 8 किमी3। जामिया से तिलकनगर 28 किमी4। निजामुद्दीन से नंदनगरी 15 किमी5। मूलचंद से जहांगीरपुरी 27.5 किमी6. कोण्डली से गोकुलपुरी 14 किमी7. शास्त्राीपार्क से करावल नगर 8.5
किमी

दो अन्य कोरीडोर की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार
प्रस्तावित 7 बीआरटी पर अनुमानित खर्च 1819.10 करोड़
राष्ट्रकुल खेलों तक 7 बीआरटी की योजना
सरकार ने राष्ट्रकुल खेलों तक 7 कोरीडोर बनाने की योजना बनाई है। जिनमें एक पर काम चल रहा है तथा बाकी छह के लिए सर्वे पूरा होने के बाद सरकार की व्यय वित्त समिति ने भी 1819.10 करोड़ की मंजूरी दी है। बाकी छह कोरीडोर अंबेडकरनगर से मूलचंद तक14.5 किमी, राजेन्द्र नगर से प्रगति मैदान 8 किमी, जामिया से तिलकनगर 28 किमी, निजामुद्दीन से नंदनगरी 15 किमी, मूलचंद से जहांगीरपुरी 27.5 किमी, कोण्डली से गोकुलपुरी 14 किमी व शास्त्राीपार्क से करावल नगर 8.5 किमी बनाये जाने हैं। इनमें शास्त्राीपार्क करावलनगर कोरीडोर व मूलचंद से जहांगीर पुरी तक 27.5 किलोमीटर के लंबे कोरीडोर की तो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी बन कर तैयार हो चुकी है।

प्रस्तावित 7 बीआरटी पर अनुमानित खर्च 1819.10 करोड़
2020 तक क्या है योजना
2010 तक 7 बीआरटी 115.5 किलोमीटर
2011-2015 3 बीआरटी 28 किलोमीटर
2016-2020 16 बीआरटी 166.5 किलोमीटर

मौजुदा बीआरटी

हाईकैपेसिटी बस कारीडोर पर दिन भर में होते हैं 200 बसों के ढाई हजार फेरे
व्यस्त समय में प्रति घंटा लगभग 200 बसें गुजरती हैं
काॅरीडोर से जुड़े हैं 50 रूट
4 रूटों की बसें करती हैं पूरे काॅरीडोर का इस्तेमाल
पैदलयात्रियों व साईकिल सवारों के लिए अलग लेन
विकलांगों को विशेष प्राथमिकता
मौजुदा बीआरटी पर पैदल यात्रियों के लिए बने हैं 6 क्रांसिंग
प्रत्येक क्रासिंग पर तैनात हैं मार्शल
अधिकतम 180 सैकेण्ड की होगी रेड लाइट
बस स्टाॅप के लिए है कलर टोन
स्टाॅप से सट कर खड़ी होती हैं बसें

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम
बीआरटी को लेकर मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित के इरादे ने एक बार फिर बीआरटी की प्रासंगिकता पर बहस खड़ी कर दी है। मुख्यमंत्राी भले ही बीआरटी को जारी रखने का एलान कर चुकी हैं लेकिन असली परीक्षण तो अभी भी होना है। जहां अगले दो वर्ष में 111.5 किलोमीटर के 6 बीआरटी की योजना प्रस्तावित हो वहां मात्रा 5.6 किलोमीटर बीआरटी का विवादित परीक्षण कितना उचित होगा यही बड़ा सवाल है। मुख्यमंत्राी ने मौजुदा बीआरटी के अगले हिस्से में कुछ परिवर्तन करने की बात कही है लेकिन नये परिवर्तनों के बाद भी दिल्ली में बढ़ता यातायात और छोटे वाहनों की बढ़ती संख्या क्या बीआरटी की राह नहीं रोकेगी इसे लेकर संदेह है। फिर राजधानी की सड़कों की चैडाई भी एक बड़ी समस्या है।
अप्रैल माह में जब राजधानी के पहले बस रेपिड ट्रांजिट काॅरीडोर (बीआरटी) को शुरु करने का सपना साकार हुआ तो इसकी सफलता को लेकर भी सवाल खड़े हो गये। जिस उत्साह के साथ सरकार ने बीआरटी परियोजना शुरु की थी वह उत्साह तार तार हो गया और बीआरटी को लेकर बुने गये सपने भी बिखरने लगे। राजधानी में हालांकि अंबेडकर नगर से दिल्लीगेट तक बनने वाले 14.5 किलोमीटर कोरीडोर का पूर्ण निर्माण अभी नहीं हुआ है और प्रथम चरण में अभी केवल 5.6 किलोमीटर काॅरीडोर ही बनकर तैयार हुआ है और इसी पर तमाम परीक्षण हो रहे है।

8 माह में भी खत्म नहीं हुआ परीक्षण

दिल्ली इंटीग्रेटिड मल्टी माॅडल ट्रांजिट सिस्टम (डीम्टस) की परियोजना के तहत राजधानी का पहला बस रेपिड ट्रांजिट काॅरीडोर (हाई कैपिसिटी बस काॅरीडोर) अंबेडकर नगर से दिल्ली गेट तक लगभग 14।5 किलोमीटर लंबा बनाया जाना है। लंबे समय से इस काॅरीडोर का निर्माण कार्य चल रहा है लेकिन निर्माण में लगातार हो रही देरी के चलते गत अप्रैल माह में 5.6 किलोमीटर अंबेडकर नगर से मूलचंद तक लंबा काॅरीडोर ही परीक्षण के लिए शुरु किया गया। पहले बीआरटी के 5.6 किलोमीटर कोरीडोर को 20 अप्रैल को जब परीक्षण के लिए खोला गया था तो कोरीडोर निर्माण में लगे एजेंसियों ने एक सप्ताह के भीतर ही इसका औपचारिक उद्घाटन करने की योजना बनाई थी लेकिन सामने आ रही अनेक समस्याओं के चलते आज तक इसका उद्घाटन नहीं हो सका है और इसे सफल करने के लिए रोजाना नये नये परीक्षण हो रहे हैं। बीते आठ माह में डीम्टस अपने परीक्षण पूरे नहीं कर सका है। सिग्नल,

जाम व वाहनों की संख्या है बड़ी समस्या

मौजुदा बीआरटी पर वाहनों का जाम, वाहनों की बढ़ती संख्या और सिग्नल व्यवस्था बड़ी समस्याएं हैं। कोरीडोर निर्माण में लगे विशेषज्ञों ने कोरीडोर पर जाम की स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञों से सिग्नल अंतराल निर्धारित किया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद प्रत्येक सिग्नल पर वाहनों को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। इसका प्रमुख कारण छोटे वाहनों की भारी संख्या है। बसों को अलग लेन मिलने से जहां बस चालक और बस यात्राी तो खुश हैं लेकिन कार, स्कूटर, मोटरसाईकिल आदि छोटे वाहन चालकों के सामने प्रत्येक सिग्नल पर लंबे इंतजार की समस्या उत्पन्न हो गई है और इस इंतजार को खत्म करने का कोई रास्ता बीते आठ माह में विशेषज्ञ नहीं ढूंढ पाये हैं।

बस और छोटे वाहनों की संख्या

मौजुदा कोरीडोर पर 5.6 किलोमीटर की इस छोटी लंबाई में ही बस लेन पर दिन भर में 200 बसों के लगभग ढाई हजार फेरे लगते हैं जबकि व्यस्त समय में मात्रा आधे घंटे में ही ढाई हजार से अधिक छोटे वाहन कोरीडोर से गुजरते हैं, वाहनों की यही संख्या ही विवाद का कारण है। आलोचकों का तर्क है कि एक ओर दिन भर में बसों के ढाई हजार फेरों के लिए अलग बस लेन और दूसरी ओर मात्रा आधे घंटे में गुजरने वाले ढाई हजार वाहनों के लिए मात्रा एक लेन। अनेक परिवहन विशेषज्ञ जहां इस काॅरीडोर के समर्थन में तर्क देते रहे हैं वहीं काॅरीडोर के विरोधियों का कहना है कि इस काॅरीडोर के निर्माण से सड़कों पर वाहनों की गति तो धीमी हो ही रही है साथ ही छोटे वाहनों की लेन भी संकरी हो रही है।

अब नये परिवर्तन की तैयारी

मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित ने मौजुदा बीआरटी के विस्तार के दौरान कुछ परिवर्तन करने व खामियों को दूर करने की बात कही है। इनमें बड़ा परिवर्तन बस लेन को बीच से हटाकर बांयी ओर लाना है। इसके अलावा सिग्नल, जाम, आदि से संबधित खामियों को भी उन्होंने दूर करने की बात कही है लेकिन बस लेन को बांयी ओर करने में सबसे बड़ा खतरा दुर्घटनाओं का है क्योंकि अक्सर पैदल यात्राी व दुपहिया सवार बांयी ओर ही चलते हैं, अलग बस लेन में दौड़ती तेज रफ्तार बसें दुर्घटनाओं का कारण हो सकती है। इसके अलावा अन्य वाहनों को दायें, बायें मुढ़ने मे ंएक बार फिर सिग्नल समय की नई समस्या सामने आ सकती है।

सवाल हैं कायम

इस काॅरीडोर की सफलता को लेकर जो सवाल इसका निर्माण शुरु होने से पहले उठ रहे थे वह आज भी कायम है, एक परीक्षण तो राजधानी की जनता देख चुकी है अब मौजुदा कोरीडोर के दूसरे चरण को भी नये परिवर्तनों के साथ जारी रखने का एलान हो ही चुका है, क्या दूसरे चरण में संबधित विभाग व सरकार की नाक बचेगी इसे लेकर कयास लगाये जा रहे है।

मौजुदा कोरीडोर से जुड़ी हैं 50 रूटों की बसें

अप्रैल माह से शुरु हुए राजधानी के पहले बस काॅरीडोर के 5।6 किलोमीटर हिस्से से 50 रूटों की 200 बसें जुड़ी हैं जो कोरीडोर के किसी न किसी हिस्से से होकर गुजरती है। अभी तक मात्रा 4 रूटों की बसें ही इस पूरे कोरीडोर का इस्तेमाल कर रही है। रूट संख्या 419, 423, 521 तथा 522 रूटों की बसें मौजुदा काॅरीडोर का पूरा इस्तेमाल कर रही है। व्यस्त समय के दौरान काॅरीडोर पर प्रति घंटा 75 से 200 बसें दौड़ती है। कोरीडोर में पैदल यात्रियों व साईकिल सवारों के लिए अलग लेन है तथा सड़क पार करने के लिए पैदल यात्रियों के लिए 6 जेब्रा कासिंग हैं जहां पर पर वर्दीधारी मार्शल तैनात किये गये हैं। बसों के लिए बनाये गये प्लेटफार्म कलर टोन पर आधरित है तथा प्लेटफार्म पर जीपीएस सुविधा भी है ताकि यात्रियों को आने वाली बस की सूचना मिल जाये।


क्या है बीआरटी
बस रेपिड ट्रांजिट एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सड़क पर बसांे की रफ्तार को कायम रखने के लिए बसों को अलग लेन दी जाती है। बीआरटी का मुख्य मकसद सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना तथा निजी वाहनों के प्रयोग को कम करना है। इसके पीछे परिकलपना यह है कि यदि बसें निर्विघ्न अपनी लेन में दौड़ती रहेंगी तो यात्री अपने वाहनों का प्रयोग करने के लिए गंतव्य तक जाने के लिए बसों का प्रयोग करेंगे। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए उठाये जा रहे कदमों मैट्रो रेल, मोने रेल, ट्रामा आदि की श्रंखला में ही बीआरटी की कल्पना की गई है।

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

आखिर भाजपा क्यों नहीं जीत सकी दिल्ली का दिल

कहां हुई भूल, क्यों नहीं खिला फूल

कहीं भूल, कहीं गलती और कहीं अति आत्मविश्वास बना हार का कारण
दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
टिकट वितरण में हुई मनमानी
पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय साबित हुआ गलत
जनाधार वाले स्थानीय नेताओं की हुई उपेक्षा
परिसीमन के दौरान निष्क्रियता से ही शुरु हुआ हार का सफर
संगठन चुनाव में चहेतों को बांटे पद
आम कार्यकर्ता संगठन से हुआ दूर
अनिवासियों की ताकत को नहीं समझ पाई भाजपा
पार्टी के दिग्गजों की चिंता रही सिर्फ चहेतों को जिताने पर
अनेक गलत फैसले पड़े भारी
प्रत्याशियों के पास थी कार्यकर्ताओं की कमी
स्टार प्रचारकों की सभाओं में भी उलझे रहे प्रत्याशी व कार्यकर्ता
मुद्दों का सही चयन नहीं कर पाये चुनाव मैनेजर
जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन नहीं चला
मुख्यमंत्री पद पर मल्होत्रा को भी स्वीकार नहीं कर पाये मतदाता
अंत तक उठते रहे बगावत के स्वर
बसपा ने ही बचाई लाज
अनाधिकृत कालोनियों को सर्टीफिकेट पडे महंगे

संजय टुटेजा
अब मंथन होगा, हार का मंथन, कहां तो शानदार जीत और सरकार बनाने के सपने और कहां शर्मनाक हार। एैसी हार जिसने भाजपा के चुनाव मैनेजरों को शर्मसार कर दिया है। पार्टी के दिग्गज आज नजरे चुरा रहे हैं, नजरें मिलाएं भी तो कैसे, आखिर अंतिम समय तक आत्मविश्वास से लबरेज जीत के नगाड़े पीटे जा रहे थे। अब कोई मुद्दो को गलत बताकर अपना बचाव कर रहा है तो कोई चुनाव प्रबंधन और टिकट वितरण को हार का जिम्मेदार मान रहा है। इन मैनेजरों के पास तो अब भी बचाव के पचास बहाने हैं लेकिन आम कार्यकता इस हार से आहत है। कार्यकर्ताओं की पीड़ा यह है कि मात्रा एक महिला शीला दीक्षित से एक पूरा संगठन हार गया। कार्यकर्ताओं की जबान परं बस एक ही सवाल है कि जब एक महिला एक पूरी पार्टी को विजयी बना सकती है तो फिर एक पूरी पार्टी और तमाम स्टार प्रचारक दिल्ली का दिल क्यों नहीं जीत सके।
अब फिर शुरुआत होगी, सत्ता के सफर की नई शुरुआत और पांच वर्ष का लंबा इंतजार। प्रदेश भाजपा के तमाम दिग्गज अब हार के मंथन और विशलेषण की बात कर रहे हैं, मंथन तो पिछली हार के बाद भी हुए थे और विशलेषण कर कमियां भी ढूंढी गई थी लेकिन फिर गलतियां हुई, फिर भीतरघात हुई, फिर मनमानी हुई और एक बार फिर निश्चित जीत के सपने भी देखे गये। सपनों को साकार करने की पहल न तो 1998 की हार के बाद शुरु हुई और न ही वर्ष 2003 की हार के बाद शुरु हुई, आज आम कार्यकर्ताओं का यही कहना है कि यदि पार्टी ने सचमुच दिल्ली का दिल जीतने की कोई पहल पिछले दस वर्षो में की होती तो निश्चित रूप से पार्टी के तमाम दिग्गज आज इस शर्मनाक हार पर शर्मसार न होते। जिन विधानसभा सीटों पर भाजपा अपनी साख बचाने में कामयाब रही है वहां का आम कार्यकर्ता भी पार्टी के भीतर बढ़ती सामंतवादी प्रवृति से दुखी है। एक अनुशासित पार्टी के कार्यकर्ताओं की टीस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश मुख्यालय पर आज बुराड़ी की एक महिला कार्यकर्ता की आंखों में बुराड़ी की जीत पर खुशी नहीं बल्कि अपने नेताओं की मनमानी को लेकर गुस्सा और चेहरे पर टीस थी।
आम कार्यकर्ता की जबान पर जो सवाल हैं उनमें से किसी का जवाब पार्टी व इस चुनाव के मैनेजरों के पास नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष डा.हर्षवर्धन बस यह कह कर चुप हो जाते हैं कि ‘एैसी उम्मीद नहीं थी’ तो उधर चुनाव के प्रमुख मैनेजर अरुण जेटली साफगोई से हार की जिम्मेदारी ले रहे हैं लेकिन कार्यकर्ता यह पूछ रहे हैं कि क्या दिग्गजों के यह बयान पार्टी का कुछ भला कर पायेंगे। कांग्रेस की दस वर्षो की सत्ता के बावजूद न तो इनकमबैंसी का असर और न ही सरकार के प्रति जनता की नाराजगी का कोई असर। आखिर सरकार की खामियों को क्यों नहीं भुना पाई भाजपा, इसके एक नहीं अनेक कारण है और अब आम कार्यकर्ता इन्हीं कारणों का पोस्टमार्टम चाहता है।

परिसीमन से ही शुरु हो गई थी हार
विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की शुरुआत तो परिसीमन से ही हो गई थी। परिसीमन के दौरान ओपी कोहली व प्रो।विजय कुमार मल्होत्रा को परिसीमन में भाजपा की राय रखने की जिम्मेदारी पार्टी ने दी थी लेकिन 70 विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन कांग्रेस नेताओं के प्रस्ताव पर हो गया और भाजपा की ओर से प्रस्ताव तक तैयार नहीं किया गया, नतीजतन कांग्रेस के नेताओं ने विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन अपनी जीत के समीकरणों के अनुसार कराया।

दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
दस वर्ष पूर्व प्रदेश में भाजपा सरकार के पतन के बाद भाजपा प्रदेश में कोई एैसा बड़ा नेता विकसित नहीं कर पाई जिसकी दिल्ली की आम जनता तक पकड़ हो। पार्टी के कार्यकर्ताओं को पूर्व मुख्यमंत्राी मदनलाल खुराना जैसे नेता की कमी आज भी खलती है। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज व मुख्यमंत्राी पद के उम्मीदवार प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा जैसे नेता तो हुए लेकिन इनमें से किसी भी नेता ने दिल्ली को अपना कर्मक्षेत्रा नहीं बनाया और राष्ट्रीय राजनीति में ही अपना भविष्य तलाशने की कोशिश की। पिछले पांच वर्ष में प्रदेश स्तर पर डा.हर्षवर्धन, विजय गोयल व प्रो.जगदीश मुखी अपना कद इतना ऊंचा नहीं कर सके कि वह सर्वमान्य नेता बन सकें। जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन भी प्रदेश भाजपा पिछले दस वर्ष में नहीं चला सकी।
प्रत्याशियों के चयन पर सवाल
विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जो उम्मीदवार उतारे उनमे अधिकतर एैसे थे जिन्हें या तो किसी दिग्गज से दोस्ती का इनाम टिकट के रूप में मिला था या किसी को जी हजूर का ईनाम टिकट के रूप में मिला था। प्रत्याशियों के चयन हेतु गठित चयन समिति के अधिकतर सदस्य स्वयं कोई सुझाव देने के बजाय अपने टिकट के लिए स्वयं मल्होत्रा, जेटली व प्रदेश अध्यक्ष की जी हजूरी करते रहे। मल्होत्रा, जेटली और हर्षवर्धन की तिकड़ी संभावित जीत देख रही थी और अपने अधिक से अधिक चहेतों को विधानसभा में पहुंचाने की जुगत में रही।
गलत फैसले भी बने हार का कारण
भाजपा नेतृत्व अब दिल्ली में हार के मंथन के दौरान हार का दोष जिस पर भी मढ़े लेकिन हार का कारण नेतृत्व के गलत फैसले भी थे। एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्राी पद पर प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा का चयन पार्टी का गलत फैसला था तो पार्टी के ही कई नेता पार्टी द्वारा उठाये गये मुद्दों को भी गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्थानीय समस्याओं से जुड़े मुद्दे उठाने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह दी गई। अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में कमजोर व नये प्रत्याशी होने के कारण प्रत्याशियों के साथ आम कार्यकर्ता ही नहीं जुड़ा जिन क्षेत्रों में कार्यकर्ता सक्रिय भी हुए वहां स्टार प्रचारकों में उलझे रहे। पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय भी पार्टी के मैनेजरों पर भारी पड़ा। यदि जीतने में सक्षम पार्षदों को टिकट दिया जाता तो स्थिति विपरीत हो सकती थी।