शनिवार, 12 जुलाई 2008

निजीकरण की राह पर दिल्ली परिवहन निगम


आने वाली 2500 अन्य बसों की मरममत भी निजी हाथों में सौंपने की तैयारी
मरम्मत का कार्य निजी हाथों में देने से कर्मचारी हुए बेकार
छह डिपो किये टाटा के हवाले
अब तक खरीदी गई सभी 650 लोफ्लोर व 25 वातानुकूलित बसों के लिए हुआ है एएमसी कान्ट्रेक्ट
छह डिपो के एक हजार से अधिक कर्मचारी हुए प्रभावित
मरम्मत एग्रीमेंट के अनुसार बसों 95 प्रतिशत उपलब्धता देगी कम्पनी
12 वर्ष तक कम्पनी करेगी बसों की मरम्मत

शर्तो का पालन न करने पर है कम्पनी पर जुर्माने का प्रावधान
मरम्मत निजी हाथों में सौंपने से डीटीसी को प्रति बस 15 लाख रुपये की सालाना बचत
डीटीसी वर्कशाप में मरम्मत कराना पड़ता है महंगा
कर्मचारी संगठन हो रहे हैं लामबंद


संजय टुटेजा
दिल्ली परिवहन निगम धीरे धीरे निजीकरण के रास्ते पर बढ़ रहा है। निगम के के लिए खरीदी गई 650 लोफ्लोर बसों व 25 वातानुकूलित बसों की मरम्मत का कार्य भी बस निर्माता कम्पनी टाटा को सौंपे जाने के बाद अब जल्द ही खरीदी जाने वाली अन्य लगभग ढाई हजार बसों की मरम्मत भी इसी तर्ज पर निजी हाथों में सौंपे जाने की तैयारी है। पहली खेप में खरीदी गई बसों की मरम्मत के लिए निगम ने अपने छह डिपो भी टाटा को सौंप दिये हैं जिससे कर्मचारियों में आक्रोश बढ़ रहा है। दिल्ली परिवहन निगम के पास लगभग छह हजार तकनीकी कर्मचारी हैं जो बसों की मरमम्त आदि के लिए निगम की कार्यशालाओं में तैनात हैं। इसके अलावा प्रत्येक कार्यशाला में एक रिकवरी वैन व एक स्टोर वैन भी है। बसों की मरम्मत के लिए पर्याप्त कर्मचारी व तमाम संसाधन होने के बावजूद दिल्ली परिवहन निगम नई आने वाली बसों की मरम्मत का कार्य पूरी तरह निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में है। निगम ने पहली खेप के रूप में 525 लोफ्लोर बसों की खरीद का आर्डर दिया था जिसे बढ़ाकर बाद में 650 कर दिया गया। यह सभी बसें टाटा मोटर से खरीदी गई हैं और इसी कम्पनी के साथ ही इन बसों की मरम्मत का भी 12 वर्ष का एग्रीमेंट किया गया है। मरम्मत की राशि प्रति बस प्रति किलोमीटर के हिसाब से निश्चित है। मतलब जितने किलोमीटर बस चलेगी उसी अनुपात में मरम्मत करने वाली कम्पनी की आय भी बढ़ेगी। पहले वर्ष मरम्मत की यह राशि प्रति किलोमीटर 1।60 रुपये है जो प्रत्येक वर्ष बढ़ते हुए 12 वें वर्ष में बढ़कर 12 रुपये प्रति किलोमीटर हो जायेगी। नतीजतन 12 वें वर्ष में निगम की बस के एक किलोमीटर चलने पर 12 रुपये मरम्मत कर्ता कम्पनी को भुगतान मिलेगा। आगामी राष्ट्रकुल खेलों से पूर्व निगम के बेड़े में 2500 अन्य लोफ्लोर व सेमी लोफ्लोर बसें शामिल होनी है। निगम का प्रबंधन निगम के बेड़े में आने वाली सभी बसों की मरम्मत का कार्य निर्माता कम्पनी को ही देने के पक्ष में है और इसकी तैयारी की जा रही है। निगम के इस रूख को देखते हुए कर्मचारी संगठनों में रोष है और कर्मचारी संगठन भी आंदोलन के मूड में हैं। दिल्ली परिवहन मजदूर सेघ के महामंत्राी रामचन्द्र होलम्बी कहते हैं कि सरकार धीरे धीरे निगम को बेच रही है। कर्मचारियों के हितों की उपेक्षा की जा रही है और निजी कंपनियों को काम सौंप कर कर्मचारियों को बेकार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में खरीदी जाने वाली बसों की मरममत की दर भी बढ़ायी जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि निगम ने यह रवैया न बदला तो बड़ा आंदोलन होगा।

छह डिपो किये टाटा के हवाले
दिल्ली परिवहन निगम ने निगम के बेड़े में शामिल हो रही नई लोफ्लोर बसों व वातानुकूलित बसों की मरम्मत के लिए अपने छह डिपो अगले 12 वर्ष के लिए टाटा मोटर के हवाले कर दिये हैं। डीटीसी द्वारा पहले चरण में खरीदी गई 650 लोफ्लोर बसों में से अब तक 411 बसें निगम को प्राप्त हो चुकी हैं। इन बसों की मरमम्त के लिए राजधानी के चारो दिशाओं में छह डिपो टाटा को दिये गये हैं। इन डिपो में सुभाष पैलेस डिपेा, हरिनगर नगर द्वितीय डिपो, मायापुरी डिपो, हसनपुर डिपो, सुखदेव विहार डिपो तथा रोहिणी प्रथम डिपो शामिल हैं। इन डिपो में तैयार निगम के तकनीकी कर्मचारियों को वहां से अन्य डिपो में स्थानान्तरित कर दिया है। डीटीसी के पास कुल लगभग 6000 एैसे कर्मचारी हैं जो कार्यशालाओं में तैनात हैं, इनमें से लगभग एक हजार कर्मचारी उन डिपो में कार्यरत थे जो टाटा को दिये गये हैं। भले ही इन सभी कर्मचारियों को अन्य डिपो में भेज दिया गया है लेकिन इनमें अधिकतर खाली हैं क्योंकि सभी डिपो में मरम्मत कर्मचारी पहले से ही तैनात हैं।

मरम्मत निजी हाथों में देने से घाटा होगा कम: नेगी
दिल्ली परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक रमेश नेगी का कहना है कि मरम्मत निजी हाथों में देने से निगम को नुकसान नहीं बल्कि फायदा है। निगम के प्रबंध निदेशक श्री नेगी का कहना है कि निगम में तकनीकी कर्मचारियों के वेतन तथा वर्कशाप के अन्य खर्चो को देखा जाये तो प्रति किलोमीटर प्रति बस औसतन 8 रुपये किलोमीटर खर्च आता है लेकिन मरम्मत का कार्य बस आपूर्ति करने वाली कम्पनी को ही देने से यह औसत खर्च 5।45 पैसे प्रति बस प्रति किलोमीटर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि इस हिसाब से निगम को एक बस पर लगभग डेढ़ लाख की बचत मरम्मत में प्रति वर्ष होगी और 12 वर्षो में एक बस पर 15 लाख रुपये की मरम्मत खर्च में बचत निगम को होगी। उन्होंने बताया कि निर्माता कम्पनी को ही मरम्मत का कार्य देने से एक फायदा यह होगा कि 95 प्रतिशत बसें हमेशा बिल्कुल ठीक होंगी क्योंकि एग्रीमेंट के अनुसार कम्पनी 95 प्रतिशत बसों की उपलब्धता निगम को देगी, एैसा न करने पर निगम उस कम्पनी पर जुर्माना कर सकता है। उन्होंने बताया कि निगम कर्मचारियों द्वारा मरम्मत होने पर अधिकतर बड़ी संख्या में बसों की मरम्मत समय पर नहीं हो पाती क्योंकि अनेक बार स्टोर में सामान नहीं होता और सामान खरीदने की प्रक्रिया लंबी होने के कारण खरीद में देरी हो जाती है जिससे बसें खराब होकर डिपो में खड़ी रहती हैं।

1 टिप्पणी:

हर्षवर्धन ने कहा…

निजीकरण सलीके से हो सरकार के नियंत्रण (देखरेख) में होत नतीजे बेहतर ही होते हैं।