मंगलवार, 27 दिसंबर 2011
शुक्रवार, 19 अगस्त 2011
मैं रहूं, ना रहूं क्रांति की मशाल की जलती रहनी चाहिए : अन्ना
मैं रहूं, ना रहूं क्रांति की मशाल की जलती रहनी चाहिए : अन्ना
तिहाड़ से रामलीला मैदान पहुंचे अन्ना
अनशन में शामिल हुआ हजारों का सैलाब
नई दिल्ली। भष्टाचार के मुद्दे पर एक नई क्रांति की मशाल लेकर अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने कहा है कि मैं रहूं न रहूं, क्रांति की यह मशाल जलती रहनी चाहिए। उन्होंनें कहा कि यह आजादी की दूसरी लड़ाई है। अन्ना हजारे तिहाड़ जेल में 67 घंटे का अनशन करने के बाद आज दोपहर जनसैलाब के साथ रामलीला मैदान पहुंचे और राह में उन्होंने राजघाट पहुंचकर महात्मा गांधी की समाधि पर भी श्रद्धासुमन अर्पित किये। उन्होंने एलान किया कि जब तक जनलोकपाल विधेयक पारित नहीं होगा तब तक वह अनशन स्थल नहीं छोड़ेंगे।
सामाजिक कार्यकर्ता आज दोपहर लगभग सवा दो बजे भारी बरसात के बीच रामलीला मैदान पहुंचे तो वहां पहले से ही जनसैलाब उनके स्वागत व समर्थन के लिए मौजूद था। मैदान में मौजूद हजारों समर्थकों का हाथ हिलाकर स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि यह दूसरी क्रांति की शुरुआत है और ‘मैं रहूं, ना रहूं क्रांति की इस मशाल को जलते रहना चाहिये।’ उन्होंने कहा कि जब तक जनलोकपाल विधेयक पारित नहीं होगा, तब तक हम यह अनशन स्थल नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के जाने के साथ ही हमें आजादी मिली, लेकिन देश से भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ, अब यह आजादी की दूसरी लड़ाई है। उन्होंने कहा कि याह एक क्रांति की शुरुआत है। देश के सभी लोगों ने ये मशाल जलायी है। उन्होंने देश की जनता से आहवान किया कि क्रांति की इस मशाल को कभी बुझने नहीं दें। उन्होंने कहा कि चाहे मैं रहूं या ना रहूं मशाल जलती रहे। उन्होंने कहा कि जिस तरह जापान राख के ढेर से फिर उठ खड़ा हुआ, उसी तरह हमें भी उठना है। उन्होंने कहा कि अगर देश का युवा जाग गया तो इस देश का भविष्य उज्जवल है।
उन्होंने कहा कि हमें सिर्फ लोकपाल ही नहीं, बल्कि पूरा परिवर्तन लाना है। देश में गरीबों को न्याय मिले, ऐसा बदलाव लाना है।’ उन्होंने कहा कि जब तक जनलोकपाल विधेयक पारित नहीं होगा, तब तक वह रामलीला मैदान नहीं छोड़ेंगे। अनशन के पिछले चार दिन में उनका वजन कम हो जाने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि चार दिन में मेरा वजन तीन किलोग्राम कम हो गया है। लेकिन आप लोग जो आंदोलन चला रहे हैं, उससे मुझे ऊर्जा मिल रही है। उन्होंने कहा कि वजन चाहे 10 किलोग्राम भी कम क्यों नहीं हो जाये, हमारा जोश कम नहीं होगा। ्रभष्टाचार पर रोष व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जिन गद्दारों ने इस देश को लूटा है, हम उन्हें बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि अब स्वतंत्रता के दूसरे संघर्ष की शुरुआत हो चुकी है और इस संघर्ष का मकसद देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करना है। उन्होंने अपने समर्थकों से इस आंदोलन के दौरान हिंसा न करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाने की भी अपील की।
अन्ना हजारे हालांकि दोपहर लगभग सवा दो बजे रामलीला मैदान में पहुंचे लेकिन मैदान में उनके समर्थकों का जमावड़ा सवेरे छह बजे से ही शुरु हो गया था। अन्ना के मैदान में पहुंचने से पहले ही केवल दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों लोग मैदान में पहुंच चुके थे और जब अन्ना मैदान में पहुंचे तो उसके बाद उनके समर्थकों का रेला मेंदान में उमड़ पड़ा। दिन में दो बार तेज बरसात हुई लेकिन बरसात के बावजूद उनके समर्थक टस से मस नहीं हुए और भीगते हुए ही अपनी अपनी जगह पर जमे रहे। मैदान में जमा लोगों में जबरदस्त उत्साह था, हर कोई हाथों में तिरंगा या पोस्टर लिए हुए था। लोगों की जबान पर बस बंदेमातरम या अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, जैसे नारे थे। मंच से जहां देश के विभिन्न हिस्सों में ्रभष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे कार्यकर्ता बारी बारी से संबोधन कर रहे थे वहीं युवाओं की एक टीम आजादी के तरानों व जनगीतों से लोगों में उत्साह भर रही थी। देर रात तक रामलीला मैदान में लोग डटे थे। रामलीला मैदान पर पहुंचने से पहले हज़ारे ने एक मिनी ट्रक पर सवार होकर तिहाड़ जेल से मायापुरी तक जुलूस निकाला और फिर वहां से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने राजघाट पहुंचे। उन्हें इंडिया गेट भी जाना था लेकिन वह इंडिया गेट नहीं गये।
राजपथ पर उतरी अन्ना की सेना
रविवार, 28 नवंबर 2010
एलजी व शीला के टकराव पर गेंद अब केन्द्र के पाले में
शीला के गर्म तेवर के बाद शीला खेमे में है खलबली
यूडी व गृहमंत्रालय पर हमला पड़ सकता है महंगा
नई दिल्ली। सर्किल रेट मुद्दे पर सरकार व एलजी के बीच शुरु हुए टकराव के बाद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के गर्म तेवर व जवाबी हमले ने एलजी व सरकार के बीच की खाई को न केवल और चैड़ा कर दिया है बल्कि संवैधानिक अधिकारों को लेकर ऐसी बहस शुरु कर दी है जिसका जवाब अब केवल केन्द्र को देना है। शीला ने एलजी के साथ साथ केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व गृह मंत्रालय को भी जिस तरह निशाना बनाया है वह मुख्यमंत्री को महंगा भी पड़ सकता है। शीला के गर्म तेवर से हालांकि शीला खेमा उत्साहित है लेकिन मुख्यमंत्री के नजदीकी भी शीला के हमले को केन्द्र सरकार पर हमला मान रहे हैं, यही कारण है कि किसी भी अनहोनी को लेकर उनमें खलबली मची है।
सर्किल रेट के मुद्दे पर सरकार व राजनिवास के बीच शुरु हुई लड़ाई अब दोनों ही पक्षों के लिए नाक की लड़ाई बन गई है। शीला दीक्षित द्वारा एलजी के अधिकारों को सीधी चुनौती देने तथा एक के बाद एक मिसाइलें एलजी पर दागे जाने के बाद भी राजनिवास अभी खामोश है और कोई प्रतिक्रिया राजनिवास की ओर से नहीं आई है। सर्किल रेट की फाइल दोनों बार लौटाते समय भी राजनिवास ने सरकार के संवैधानिक अधिकारों पर न तो कोई टिप्पणी की थी और न ही सरकार को कोई सीधी चुनौती दी थी। राजानिवास ने दोनों बार केवल अपने सुझाव दिये थे, बावजूद इसके शीला दीक्षित ने एलजी पर सीधा हमला किया है बल्कि एलजी के संवैधानिक अधिकारों को चुनौती देने के लिए विधानसभा को माध्यम बनाया।
केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन की की सरकार है और उपराज्यपाल की नियुक्ति केन्द्र ही करता है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपनी बात विधानसभा में इस चर्चा से पहले ही गृह मंत्रालय के समक्ष रख चुकी थी, बावजूद इसके इतनी जल्दी विधानसभा में एलजी पर सीधा हमला करने की जरूरत क्यों पड़ी और इस हमले में एलजी के साथ साथ केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय और गृह मंत्रालय को निशाना क्यों बनाया गया, यह एक ऐसा सवाल है जिसका कई तरह से विशलेषण किया जा रहा है। राजनैतिक विशलेषक इसे शीला का केन्द्र सरकार व पार्टी आलाकमान पर सीधा हमला भी मान रहे हैं, जो मुख्यमंत्री के लिए मंहगा भी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री खेमे के विधायक व मंत्री भी मानते हैं कि शीला ने एलजी,यूडी व गृहमंत्रालय पर हमला कर केन्द्र से सीधी लड़ाई शुरु कर दी है।
हालांकि विधानसभा में चर्चा पूर्ण राज्य को लेकर थी, इस तरह की चर्चाएं विधानसभा का हिस्सा हो सकती हैं लेकिन यदि सरकार की मंशा यदि वास्तव में दिल्ली को पूर्ण राज्य देने का होती तो सरकार विधानसभा में चर्चा कराने से पहले केबिनेट से भी यह प्रस्ताव पारित कर सकती थी, लेकिन शायद असली मंशा एलजी पर हमला करना था, यही कारण है कि इस चर्चा की शुरुआत करने वाले विधायक मुकेश शर्मा से लेकर शिक्षा मंत्री अरविन्दर सिंह लवली व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तक सभी के निशाने पर एलजी ही रहे। यहां यह भी गौरतलब है कि विधानसभा में हुई यह चर्चा पूर्व नियोजित थी और इस पर उसी दिन सवेरे केबिनेट में भी चर्चा हुई थी। सूत्रो के अनुसार केबिनेट में ही शिक्षा मंत्री अरविन्दर सिंह लवली को भी इस मुद्दे पर बोलने के लिए अधिकृत किया गया था।
अब चूंकि शीला व एलजी के बीच शुरु हुई इस लड़ाई की गूंज पूरी दिल्ली में सुनाई दे रही है, ऐसे में अब सभी केन्द्र की ओर देख रहे हैं। चूंकि एलजी केन्द्र के प्रतिनिधि हैं ऐसे में केन्द्र शीला के भाषण को पार्टी अनुशासन की सीमा में मानता है या फिर सीमा के बाहर यह भी एक बड़ा सवाल है। इतना निश्चित है कि यदि केन्द्र शीला के तेवर को सहमति देता है तो एलजी के संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक नई तहरीर लिखी जायेगी।
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
नई दिल्ली। राजधानी का नई दिल्ली रेलवे स्टेशन मिनी एयरपोर्ट टर्मिनल बनेगा। नई दिल्ली से आईजीआई एयरपोर्ट जाने वाली एयरपोर्ट एक्सप्रेस-वे मेट्रो लाइन सितम्बर माह में शुरू होगी और इसका किराया 150 रुपए होगा। यह लाइन शुरू होने के बाद नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन राजधानी का पहला सिटी एयरपोर्ट टर्मिनल होगा। इस स्टेशन की एक विशेषता यह भी है कि कुल पांच फ्लोर्स में 4.30 लाख वर्ग फुट क्षेत्र में बना यह राजधानी का सबसे बड़ा मेट्रो स्टेशन होगा। एयरपोर्ट जाने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए बनाई गई इस लाइन की खासियत यह है कि यात्रियों को एयरपोर्ट पर चेक-इन करने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। यह ट्रेन नई दिल्ली से शुरू होगी और यहीं यात्री चेक-इन कर सकेंगे। यात्रियों का सामान संबंधित एयरलाइंस द्वारा सीधे उड़ान में भेज भेजने की व्यवस्था की जा रही है। स्टेशन पर कुल 10 एयरलाइंस के काउंटर होंगे, जहां से यात्री अपना चेक-इन कराकर बोर्डिग पास ले सकेंगे। नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन को कुल पांच फ्लोर में बनाया जा रहा है और एयरपोर्ट की तरह ही यहां प्रस्थान व आगमन के लिए अलग-अलग मिनी टर्मिनल है। पांच फ्लोरों में दो फ्लोर आगमन व प्रस्थान भूतल से उपर बनाए जा रहे है, जबकि कानकोर्स, प्लेटफार्म व मध्यतल जमीन के नीचे बनाए गए है। राजधानी के आम मेट्रो स्टेशनों से यह लगभग तीन गुना बड़ा स्टेशन होगा। इस स्टेशन के साथ मल्टीलेवल पार्किंग भी बनाई गई है। स्टेशन के प्रस्थान टर्मिनल तक जाने व अराइवल टर्मिनल से आने के लिए यात्रियों को बैगेज ट्रालियां भी उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा स्टेशन पर रेस्टोरेंट और खान-पान के अन्य आउटलेट्स व क्योस्क भी होंगे। यात्रियों की सुविधा के लिए स्टेशन पर पर्याप्त संख्या में एस्केलेटर व लिफ्ट के अलावा 17 ऑटोमैटिक फेयर कलेक्शन द्वार होंगे। इसके अलावा यात्रियों को उड़ान की जानकारी देने के लिए विभिन्न स्थानों पर डिस्पले बोर्ड भी होंगे। सुरक्षा की ष्टि से भी स्टेशन पर कड़े सुरक्षा प्रबंध किए जा रहे है। स्टेशन के चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगे होंगे। इस लाइन पर कुल छह स्टेशन होंगे, जिनमें नई दिल्ली के अलावा शिवाजी टर्मिनल, धौलाकुआं, नेशनल हाईवे-8, आईजीआई व द्वारका सेक्टर-21 है। यह लाइन लगभग बनकर तैयार है और सभी स्टेशनों पर सभी जरूरी उपकरण लगा दिए गए है। अगले कुछ दिनों में इस लाइन पर ट्रायल रन शुरू होने की संभावना है। रिलायंस इन्फास्ट्रक्चर द्वारा बनाई जा रही इस लाइन को कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले ही सितम्बर माह में शुरू कर दिया जाएगा। यह लाइन शुरु होने के बाद नई दिल्ली से आईजीआई एयरपोर्ट पहुंचने में लगभग 20 मिनट लगेंगे। 150 20 रुपए होगा कनॉट प्लेस से एयरपोर्ट तक का किराया मिनट में नई दिल्ली से पहुंचेंगे एयरपोर्ट कुल 4.30 लाख वर्ग फुट में बना है यह मेट्रो स्टेशन, पांच फ्लोर है यहां, भूतल से ऊपर होगा आगमन व प्रस्थान रेलवे व मेट्रो का जंक्शन बनेगा नई दिल्ली स्टेशन, राजधानी का पहला सिटी एयरपोर्ट टर्मिनल होगा स्टेशन पर ही होगी चेक-इन की सुविधा, 10 एयरलाइंस कंपनियों के काउंटर होंगे यहां स्टेशन के चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरों से रखी जाएगी नजर, उड़ानों के समय से संबंधित डिस्पले बोर्ड भी होंगे सितम्बर में शुरू होगी नई दिल्ली- एयरपोर्ट एक्सप्रेस-वे लिंक सेवा जल्द शुरू होगा रविवार, 4 जुलाई 2010
साहब शहर से बाहर लेकिन कार दौड़ती रही घर से आफिस
उद्योगायुक्त की गैरमौजूदगी में 450 किलोमीटर दौड़ी उनकी कार
आरटीआई के जवाब में हुआ इस धांधली का खुलासा
गृहमंत्राी से की उद्योगायुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग
नई दिल्ली। इसे विज्ञान का चमत्कार कहें या फिर जादू लेकिन यह हकीकत है कि कमिश्नर इण्डस्ट्री लगभग एक सप्ताह की छुट्टी पर दिल्ली से बाहर रहे और उनकी सरकार कार उन्हें लेकर उनके घर से कार्यालय व सचिवालय के चक्कर लगाती रही। वास्तविकता में भले ही यह संभव न हो लेकिन उनकी सरकारी कार ने यह कारनामा कर दिखाया है। उनकी गैर मौजूदगी में उनकी कार लगभग एक सप्ताह तक 450 किलोमीटर से अधिक सड़को ंपर दौड़ी है और यह दौड़ उनके घर से कार्यालय व सचिवालय के बीच ही हुई है। इस बात का खुलासा एक आरटीआई में होने के बाद इसकी शिकायत केन्द्रीय गृह मंत्राी पी चिदंबरम से भी की गई है।
दिल्ली के कमिशनर इण्डस्ट्री के पद पर वर्तमान में आईएएस अधिकारी चेतन बी सांघी तैनात हैं। इसके अलावा उनके पास डीएसआईआईडीसी के प्रबंध निदेशक के अलावा दिल्ली खादी विलेज बोर्ड का भी प्रभार है। उद्योग आयुक्त सांधी 15 फरवरी सोमवार को तीन दिन की छुट्टी पर हैदराबाद गये थे। इस छुट्टी की अनुमति उन्होंने मुख्य सचिव से ली थी और छुट्टी का घरेलू कारण बताया था, बाद में उन्होंने निजी कार्य का हवाला देते हुए छुट्टी को 19 फरवरी तक बढ़ा लिया। उनके छुट्टी पर जाने से दो दिन पहले 13 व 14 फरवरी को शनिवार व रविवार होने के कारण छुट्टी थी। इस प्रकार वह सात दिन छुट्टी पर रहे।
उनके छुट्टी पर रहने के बावजूद कमिशनर इण्डस्ट्री के रूप में मिली उन्हें मिली सरकारी कार संख्या डीएन 5 सीएफ 9990 सड़कों पर दौड़ती रही। कार की लाॅग बुक बताती है कि 13 फरवरी को कार दिल्ली सचिवालय से बसंतकुंज, डीएसआईआईडीसी, बसंतकुंज और फिर दिल्ली सचिवालय के बीच सवेरे 8 बजे से शाम 7 बजे तक 84 किलोमीटर दौड़ी।
15 फरवरी को जिस दिन कमिशनर इण्डस्ट्री हैदराबाद में थे, उस दिन उनकी सरकारी कार सवेरे 7.30 बजे से रात 10.30 बजे तक दिल्ली सचिवालय से बसंतकुंज उनके आवास, फिर डीएसआईआईडीसी कार्यालय, और फिर घर से होती हुई सचिवालय तक 135 किलोमीटर दौड़ी। इसके बाद 16 फरवरी को 88 किलोमीटर व 17 फरवरी को 100 किलोमीटर उनके घर से कार्यालयों के बीच उनकी कार दौड़ती रही। लागबुक के ‘दफ्तरी गाड़ी का इस्तेमाल करने वाले अधिकारी का नाम और पद’ के कालम में कमिशनर इण्डस्ट्री के रूप में ‘सी आई’ दर्शाया गया है जो यह बताता है कि कार कमिश्नर इण्डस्ट्री को लेकर दौड़ती रही।
यह सारी जानकारी डीएसआईआईडीसी ने एक आरटीआई के जवाब में दी है। आरएन बरारिया नामक व्यक्ति द्वारा मांगी गई इस जानकारी का जवाब 20 मई को दिया गया है। आरटीआई का जवाब मिलने के बाद आरएन बरारिया ने कमिश्नर इण्डस्ट्री चेतन बी सांघी पर सरकारी कार का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए उनकी शिकायत केन्द्रीय गृहमंत्राी पी चिदंबरम से की है।
गृहमंत्राी को भेजी गई शिकायत में कहा गया है कि कमिश्नर इण्डस्ट्री की सरकारी कार फरवरी माह के 24 दिन में 2529 किलोमीटर दौड़ी है जिससे पता चलता है कि प्रतिदिन औसतन 106 किलोमीटर उनकी कार सड़कों पर दौड़ती रही है। प्रतिदिन राजधानी के भीतर इतनी दूरी तय करने में किसी भी वाहन को 4 से 5 घंटे लगते हैं। शिकायती पत्रा में कहा गया है कि लगभग 5 घंटे अपनी कार में व्यतीत कर इण्डस्ट्री कमिश्नर एक साथ डीएसआईआईडीसी व कमिश्नर इडस्ट्री के अलावा खादी विलेज इण्डस्ट्री बोर्ड का कामकाज कैसे करते होंगे। बरारिया ने चिदंबरम को भेजे पत्रा में इसे धोखाधड़ी का मामला बताते हुए इसके लिए सीधे सीधे कमिश्नर इडस्ट्री को जिम्मेदार बताया है और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
ऐसे करते है विदेश में देश का नाम बदनाम

ये भी है एक सच
देश की छवि को बिगाड़ने की कोशिश
नई दिल्ली। वहां गरीबी भी है और कठिनाईयों में जूझती जिंदगी भी है। हो सकता है कि उनकी हालत स्लम या जेजे कलस्टर में रहने वाले लोगों से भी दयनीय हो लेकिन दूध मूंहे बच्चों से कामनवेल्थ गेम परियोजना पर काम कराने की जो तस्वीर विदेशी मीडिया विश्व को दिखा रहा है उस तस्वीर के पीछे का सच विदेशी मीडिया की विश्वसनीयता को तार तार कर रहा है। इसके पीछे कभी विश्व में मीडिया के जरिए भारत की गरीबी को बेचने की मानसिकता दिखाई देती हैै तो कभी विदेशी खबरनवीसों की दिमागी खुराफात विश्व में भारत की छवि को कलंकित करती दिखाई देती है लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू यह भी है कि अगर कहीं निर्माण में लगे श्रमिक गरीबी के चलते अपने बच्चों को स्कूल न भेज सकने कोे अभिशप्त हैं तो वहीं इसी देश में गरीब नौनिहालों का भविष्य संवारने के लिए स्वैच्छिक संस्थाओं की कतार भी दिखाई दे रही है। कभी कोई फिल्मकार आस्कर जीतने के लिए इस देश की अस्मत को पूरे विश्व में लुटाता है तो कभी कोई विदेशी मीडियाकर्मी मानवीयता के बहाने भारत की गरीबी को बेचने की कोशिश करता है लेकिन यह कोई आस्कर विजेता स्लम डाॅग की कहानी नहीं है कि इसके जरिए स्लम के नौनिहालों को डाॅग की तरह पेश कर आस्कर जीते जा सकें, और न ही यह विदेशी मीडिया की वह बदरंग रिर्पोट है जिसमें दूध मूंहे बच्चों को निर्माण स्थलों पर दिखाया गया है, यह वास्तव में वह सच है जो सच विदेशी मीडिया में प्रकाशित खबर की खबर तो लेता ही है साथ ही विदेशियों की भारत के बारे में बनी मानसिकता को भी प्रदर्शित करता है। किसी भी स्वाभिमानी भारतीय के लिए दिल को कचोटनी वाली खबर यह है कि लंदन के एक अखबार मेल आनलाइन ने निर्माण स्थलो ंपर खेलते बच्चों की तस्वीरों के जरिए अपनी रिपोर्ट में यह बताने की कोशिश की थी कि भारत में कामनवेल्थ परियोजनाओं पर दूध मूंहे बच्चों से भी काम कराया जा रहा है, लेकिन इस खबर का सच यह है कि निर्माण मजदूरों की कालोनियों में इन नौनिहालों के लिए एैसे क्रेच चलाये जा रहे हैं जहां उन्हें आहार भी दिया जाता है, शिक्षा भी दी जाती है और बचपन का लाड प्यार भी। मोबाइल क्रेच नामक एक स्वैच्छिक संस्था तो इंदिरागांधी स्टेडियम, जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम, शिवाजी स्टेडियम, इंदिरागांधी स्टेडियम, सिरी फोर्ट तथा खेल गांव में कार्य कर रहे मजदूर परिवारों के बच्चों के लिए पांच क्रेच चला रही है। हमने एक क्रेच में जाकर वहां की तस्वीर देखी निर्माण में लगी महिला मजदूरों का इन क्रेच के प्रति उत्साह भी देखा। स्टेडियम के निकट ही बसी अस्थायी लेबर कालोनी में कभी आसाम के रंगिया निवासी दीप लाल अपनी 3 वर्षीय बच्ची कंचन व बेटे पंकज को गोद में लेकर क्रेच की ओर बढ़ता दिखाई देता है तो कभी महिला मजदूर सुजिता, कुमुदनी, हस्ता व पूजा अपने बच्चों को लेकर क्रेच की ओर बढ़ती दिखाई देती है। वह बताती हैं कि सवेरे 9 बजे वह क्रेच में अपने बच्चों को लेकर जाती हैं ओर शाम 5 बजे काम से वापस लौटने के बाद बच्चों को वहां से लेते हुए घर पहुंचती है। इस क्रेच में बच्चों के लिए वह सब कुछ उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है जिसे उसकी जरूरत है। दो बार नाश्ता व दोपहर में खाना दिये जाने के अलावा क्रेच में नियुक्त शिक्षिकाएं मनोयोग से इन बच्चों की देखभाल करने के साथ साथ प्राथमिक शिक्षा भी उपलब्ध कराती है। मोबाइल क्र्रेच की निदेशक मृदला बजाज के मुताबिक सभी पांच क्रेच में निर्माण मजदूरों के 400 से 500 प्रतिदिन लाये जाते हैं जिन्हे उनके माता पिता वहां छोड़कर मजदूरी करने जाते है।
सोमवार, 2 नवंबर 2009
हम कब सीखेंगे एक शहर मे रहने की तहजीब
- जगह जगह करते हैं पानी की बरबादी
बातचीत के लहजे में आखिर क्यो है रुखापम
आफिस हो या घर दीवारें हो गई हैं पीकदान
सड़क पार करने का नहीं है सलीका
फुट ओवर ब्रिज के बावजूद जान जोखिम में डालकर करते हैं सड़क पार
अंडर पास को हमने खुद बना दिया है नशेड़ियों व भिखारियों का अड्डा
भिखारियों को बढ़ावा देकर दे रहे हैं भिक्षावृति को प्रोत्साहन
यहां की भिक्षावृति है विदेशियों के सामने एक बड़ा कलंक
वाहन चालक सड़कों पर रेड लाइट जम्प करने में महसूस करते हैं गौरव
रेड लाइट पर जेब्रा क्रासिंग से आगे गाड़ी खड़ी करने से मिलती है आत्म संतुष्टि
सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने में हम हैं माहिर
सरकारी सम्पत्ति को नष्ट करना हो गया है हमारा अधिकार
यातायात नियमों का पालन करने में हमें होती है शर्मीन्दगीसड़कों पर पैदल चलने का भी नहीं है सलीका
पैदल चलते वक्त महिलाओं को घूरती हैं निगाहें
सड़कों पर मौज मस्ती के नाम पर अशलील हरकतें
सड़कों पर जगह जगह थूकना मानों है हमारा अधिकार
कूड़ा फैंकने के लिए आखिर क्यों उठायें कूड़ेदान तक जाने की जहमत
सार्वजनिक स्थानों पर ध्रुमपान तो हम करेंगे ही
बसों में ड्राइवरों, कंडक्टरों का व्यवहार है जगजाहिर
बसों में अन्य यात्रियों से अभद्र व्यवहार में हम स्वयं भी नहीं हैं कम
बात बात पर है झगड़ने की आदत
बसों में महिलाओं से छेड़खानी का ढूंढते हैं बहाना
अपने काम के प्रति नहीं होंगे जिम्मेदार
मेट्रो, बस व ट्रेनों में चढ़ने की नहीं सीखेंगे तहजीब
धक्का मुक्की करना अब हो गई है आदत
स्टेशन पर ट्रेन खड़ी होने के बाद ही करेंगे ट्रेन के शौचालय का प्रयोग
सार्वजनिक स्थानों पर शौच व लघुशंका से नहीं है गुरेज
सार्वजनिक शौचालयों में फैलाते हैं गंदगी
बात बात पर झूठ बोलना हो गया है दिनचर्या का हिस्सा
सामने वाले को हरगिज नहीं देंगे तरजीह
सामने वाले पर अपनी बात थोपना है हमारा अधिकार
शराब पीकर वाहन चलाने में आता है मजा
सड़कों पर स्पीड लिमिट का उल्लंघन करके ही मिलती है आत्म संतुष्टि
पर्यावरण की चिंता हम क्यों करें, करेगी सरकार
सड़कों के किनारे या सार्वजनिक स्थानों पर नशा करना है आदत
अगर हम आटो व टैक्सी चालक हैं तो मनमानी दरों पर ही यात्राी को ले जायेंगे
अपने बच्चों को भी नहीं सिखा रहे हैं सभ्य नागरिक जीवन के संस्कार
प्राचीन धरोहरों को कर रहे हैं खुद ही नष्ट
नदियों नहरों में ही डालेंगे अपनी समूची गंदगी
सवाल हमारी सभ्यता की साख का
अब तो सवाल साख का है, ये सवाल देश की साख का है, हमारी सभ्यता की साख का है और हमारी संस्कृति की साख का है। क्या सचमुच हमारी असभ्य हरकतों ने देश की साख बचाये रखने का संकट खड़ा कर दिया है, यही एक बड़ा सवाल है जो कामनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए तैयार हो रही देश की राजधानी की आम जनता से पूछा जा रहा है। विडंबना यह है कि अब देश की साख को बचाने के लिए जनता को जगाने की तैयारी कर रही सरकार स्वयं भी सोयी है। यह ठीक है कि सिविक सेंस के लिए हमें जागना होगा लेकिन जगह जगह स्वयं कई नागरिक समस्याएं उत्पन्न करने वाली सरकार को कौन जगायेगा। सरकार सेर तो आम जनता सवा सेर, आम जनता अपनी तहजीब भूल रही है तो सरकार अपना फर्ज भूल रही है। देश की राजधानी दिल्ली की 80 प्रतिशत जनता प्रतिदिन कदम कदम पर सिविक प्राब्लम (नागरिक समस्याओं) से रूबरू होती है और अंततः इन समस्याओं का हिस्सा बनकर समस्याओं को तो विकराल बना ही रही है अपनी मानसिकता को भी ं विकृत बना रही है, यही कारण है कि अब यही विकृत मानसिकता हमारी सभ्यता के रूप में दिखाई देने लगी है। देश के गृहमंत्राी पी.चिदंबरम हों या फिर मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित, इनका कहना है कि दिल्ली वासियों को शहरों में रहने के तौर तरीके सीखने होंगे। इनके कहने का निहितार्थ यही है कि यदि दिल्ली वासियों ने अच्छे व बडे शहरों में रहने के तौर तरीके न सीखे तो कामनवेल्थ गेम के दौरान आने वाले हजारों विदेशी मेहमानों के सामने देश व दिल्ली की छवि पर बट्टा लगेगा। यह ठीक है कि यहां का आम शहरी शैक्षिक व सामाजिक रूप से जितना सभ्य हो रहा है, व्यवहारिक रूप से उतना ही असभ्य हो रहा है, खासकर सिविक सेंस के प्रति तो मात्रा 5 से 10 प्रतिशत शहरी ही गंभीर होंगे। सामाजिक ढांचा ही इस तरह का खड़ा हो गया है कि इस ढांचे का हर प्राणी, चाहे वह नौकरशाह हो या मजदूर, चाहे वह राजनीतिज्ञ हो या व्यापारी,उद्यमी, क्लर्क हो या अफसर, डाक्टर हो या मरीज सभी तो कदम कदम पर अपनी असभ्यता को प्रकट कर ही देते है तभी तो अब दिल्ली वासियों को एटीकेट व एटीटयूड सिखाने की बात की जा रही है। यह हमारी आदत हो गई है कि जिस काम के लिए हमें मना किया जायेगा, उसे करने में हमें गौरव हासिल होता है। जहां लिखा होगा थूकना मना है, हम वहीं थूकेंगे, सड़कों पर नो पार्किंग के बोर्ड लगे होंगे और हम उनके सामने ही अपना वाहन पार्क करेंगे। सड़कें, ट्रेन, बस, रिक्शा, टैक्सी, आटो, अस्पताल, हैल्थ केयर सेंटर, खेल मैदान, होटल, रेस्टोरेंट, क्लब, स्कूल कालेज हर जगह हम खुद इस तरह की अस्भ्यता के शिकार भी होते हैं और इस तरह की असभ्यता प्रदर्शित भी करते हैं। दिल्ली में सिविक समस्याएं बढ़ रही हैं तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है, इसके लिए दोषी कौन यह एक ऐसा सवाल है कि पहले मुर्गी या पहले अंडा। जवाब सीधा और सरल है वह यह कि आम जनता हो या सरकार में बैठे लोग सभी की सिविक समझदारी, सकारात्मक सोच तथा समाज, शहर व व्यक्तियों के लिए जिम्मेदारी कम हो रही है।
क्या कहते हैं चिदंबरम- कामनवेल्थ गेम के दौरान बाहर से आने वाले मेहमानों पर अपने व्यवहार से अच्छा प्रभाव डालने के लिए दिल्ली के लोगों को अपनी बुरी आदतें बदलनी होंगी, तभी हम उन्हें प्रभावित कर सकते है। देश भर से लोग दिल्ली आते हैं, हम उन्हें दिल्ली आने से रोक नहीं सकते लेकिन अगर वह दिल्ली आते हैं तो उन्हें दिल्ली के प्रति खुद को व्यवहारिक बनाना होगा। दिल्ली के लोगों को एक बड़े अन्तर्राष्ट्रीय शहर के नागरिकों की तरह व्यवहार करना चाहिए।
- मजबूरी भी है नगरीय तहजीब का उल्लंघन
दिल्ली की जनता को विश्व स्तरीय नगरीय जीवन की तहजीब सिखाने की कवायद पर तो बहस हो रही हैै लेकिन जो लोग नगरीय जीवन की तहजीब में स्वयं को बांधे रखना चाहते हैं उनके सामने भी तहजीब के इस दायरे को तोड़ने की कई मजबूरियां है। यह वह वर्ग है जो तहजीब सीखने से पहले अपनी मजबूरियों का हल चाहता है। दरअसल ऊंची इमारतों व आकर्षक फ्लाईओवरों ने भले ही दिल्ली के चेहरे को चमकदार बना दिया हो लेकिन जिस तरह पिछले पांच दशक में दिल्ली का बेढंगा विकास हुआ है उसने एैसी बदरंग दिल्ली बनाई है कि इसमें रंग भरने में लंबा समय लगेगा। जिस राजधानी में लगभग 1600 अनाधिकृत कालोनियां हों और हजारों झुग्गी झौपड़ियां व कलस्टर हों उस दिल्ली के आम नागरिक को नगरीय जीवन की तहजीब होगी इसकी कल्पना करना भी निरर्थक है। अनाधिकृत कालोनियांे का दौरा करने पर पता चलता है कि वर्षो से वहां कोई कूड़ेदान सरकारी स्तर पर नहीं है। सड़क या नाले नालियां ही उनके कूड़ेदान है, नतीजतन सड़कों पर कूड़ा डालना उनकी आदत हो गई है। पेयजल लाइन न होने के कारण जल निगम की पाइप लाइन को बीच में काटकर अपनी प्यास बुझाना उनकी मजबूरी है चाहे इसके बदले काटे गये स्थान से महीनों तक पानी बेकार बहता रहे क्योंकि उनके सरोकार पानी की बरबादी से ज्यादा अपनी प्यास से जुड़े हैं। जिन क्षेत्रों में वर्षो से कोई स्कूल तक नहीं है उस क्षेत्रा के बच्चों से एटीकेट व एटीटयूट की उम्मीद कैसे की जा सकती है, आखिर एैसे क्षेत्रों के बच्चों की एक पीढ़ी अब नयी पीढ़ी को जन्म दे रही है। आज इन क्षेत्रों से जन्म लेने वाली नई पीढ़ी पर नगरीय जीवन की तहजीब बिगाड़ने का आरोप भले ही लगाया जाये लेकिन असली गुनाहगार तो वह लोग हैं जिन्होंने अपने राजनैतिक स्वार्थो के लिए इस पौध को खड़ा किया है।
- कहीं अहम तो कहीं गर्वानुभूति कराती है तहजीब का उल्लंघन
सिविक सेंस यानि नगरीय तहजीब को तोड़ने में कहीं व्यक्ति का अहम प्रमुख भूमिका निभाता है तो कहीं नियम तोड़ने में होने वाली गर्वानुभूति इसका कारण बनती है। दिल्ली की कथित हाई क्लास सोसायटी के लोगों में एक बड़ा वर्ग एैसा है जो नियमों का उल्लंघन करना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानता है। हाई क्लास सोसायटी के लोगों की पहुंच भी ऊंची होती है और उनके भीतर खुद को औरों से अलग दिखने की इच्छा भी हिलौरें लेती है। ऊंची पहुंच का फायदा उठाकर ही वह नियम तोड़ते हैं और यह उनकी आदत बन जाती है। यातायात पुलिस के एक बड़े अधिकारी ने बातचीत में यह स्वीकार किया कि दिन भर उनके कार्यालय में सैंकड़ों फोन ऊंची पहंुच व ऊंचे रसूख वाले लोगों के मात्रा इसलिए आते हैं क्योंकि बीच सड़क में यातायात पुलिस ने उन्हें नियम के उल्लंघन मे ंपकड़ लिया है। चालान से बचने और संबधित यातायात पुलिसकर्मी को अपना रसूख दिखाने के लिए वह तत्काल फोन घूमाते है। इनमें एक बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की भी होती है जो सीधे सीधे यातायात पुलिसकर्मी को उसकी वर्दी उतरवाने की धमकी तक दे देते है। बड़े घरों के रईसजादे जब बाईक लेकर सड़कों पर उतरते हैं तो बाइक की रफ्तार, बीच सड़क में स्टंट और रेड लाइट जंप करना उनके लिए आम बात होती है। विडंबना तो यह है कि पकड़े जाने पर उन्हें चालान का भी कोई भय नहीं होता और यातायात पुलिस कर्मी के पहुंचने से पहले ही वह अपनी जेब से चालान के जुर्माने की राशि हाथ मे लेकर लहराने लगते हैं। दक्षिणी दिल्ली व पश्चिमी दिल्ली में अक्सर इस तरह के बाइक सवारों को देखा जा सकता है जो जानबूझ कर नियमों का उल्लंघन करते हैं। एैसा कर उन्हें गर्व की अनुभूति होती है।- सजा कम होना भी है एक बड़ा कारण
राजधानी के लोगों में सिविक सेंस न होने का एक बड़ा कारण नियम तोड़ने या नगरीय तहजीब का उल्लंघन करने पर सजा कम होना भी है। या तो इनफोर्समेंट एजेंसियां काम ही नहीं करती, यदि काम भी करती हैं तो सजा इतनी कम होती है कि उसका कुछ प्रभाव नहीं होता। कुछ समय पहले ही सार्वजनिक स्थानों पर धु्रमपान पर रोक लगा दी गई थी, जिसे लेकर मीडिया ने भी काफी प्रचार किया था लेकिन आज स्थिति यह है कि इस कानून के कोई मायने नहीं है। यातायात नियमों के उल्लंघन के मामले में पुलिस कुछ कठोर जरूर है लेकिन वहां चालान की राशि इतनी कम है कि चालान का कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह सड़कों के किनारे खड़े होकर लघु शंका करने जैसी हरकतें हों या फिर सड़कों पर पैदल चलने की तहजीब, इन मुद्दों को न तो यह सब करने वाले गंभीरता से लेते हैं और न ही शासन की सिविक एजेंसियां गंभीरता से लेती हैं। दिल्ली को साफ रखने की बात तो की जाती है लेकिन सड़कांें पर चलते समय थूकना, फास्ट फूड के खाली रैपर फंैंकना, कोल्ड ड्रिंक के खाली टीन के छोटे ड्रम फेंकना आम बात है। पार्को की स्थिति तो इससे भी दयनीय है, लोग पार्क में घूमने जाते हैं और गंदगी फैलाकर वापस लौटते हैं लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें सबक सिखाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की जाती। दीवारों पर पोस्टर प्रतिबंधित करने के लिए नया डिफेसमेंट एक्ट बना लेकिन पोस्टर लगाने, दीवारे पोतने के आरोप में कभी किसी को बड़ी सजा की खबर सुनाई नहीं दी, ऐसे में एैसे कानून का औचित्य ही लोगों की नजर में नहीं रहता। कानून का उल्लंघन करने वाले भी इस बात को जानते हैं कि उन्हें सजा मिलना तो दूर उनकी इस गलती को गंभीरता से भी कोई नहीं लेगा। मेट्रो स्टेशनों पर मेट्रो में सवार होने की तहजीब सिखाने के लिए डीएमआरसी प्रशासन लगातार न केवल स्टेशनों पर फिल्मों का प्रदर्शन कर रहा है बल्कि प्रमुख स्टेशनों पर गार्ड भी तैनात किये गये हैं बावजूद इसके जब ट्रेन आती है तो ट्रेन से उतरने वाले यात्रियों व सवार होने वाले यात्रियों में गुत्थमगुत्था रोजाना होती है और इस दौरान महिलाओं को तो अक्सर छेड़छाड़ का शिकार भी होना पड़ता है लेकिन बावजूद इसके एैसी गुत्थमगुत्था करने वालों पर कोई बड़ा जुर्माना कभी नहीं हुआ। यह स्थिति सभी विभागों से संबधित नियमों के उल्लंघन पर लागू हो रही है और विभागों के अधिकारी स्वयं ऐसे नियमों का उल्लंघन करते देखे जाते हैं।- स्कूलों में नहीं है नगरीय तहजीब सिखाने का पाठयक्रम
आम जनता को नगरीय तहजीब सिखाने की बातें तो अक्सर की जाती हैं लेकिन इसमें सबसे बड़ी खामी हमारी शिक्षा व्यवस्था में इस तरह का कोई पाठयक्रम न होना भी है। स्कूलों में शैक्षिक विकास पर तो बल दिया जाता है लेकिन दैनिक जीवन व नगर से जुड़ी जरूरी बातों को अक्सर उपेक्षित रखा जाता है। राजधानी दिल्ली को अब विश्वस्तरीय नगर बनाने की बात की जा रही है और विश्व के अन्य देशों से इसकी तुलना भी की जाने लगी है नतीजतन इस तुलना में दिल्ली अन्य देशों के नगरों से पीछे दिखाई देती है, इसका प्रमुख कारण वहां के लोगों की नगरीय तहजीब यानि सिविक सेंस है। दरअसल विदेशियों में इस तरह की सिविक सेंस का एक बड़ा कारण उनकी शिक्षा व्यवस्था है। वहां के किसी छोटे स्कूल का छात्रा भी इस तहजीब में बंधा दिखाई देता है क्योंकि स्कूल में शिक्षा के साथ साथ आम नागरिक जीवन के पहलुओं को भी सिखाया पढ़ाया जाता है। राजधानी में शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी यह है कि शिक्षा व्यवस्था भी सरकार और एमसीडी में बंटी है और पाठयक्रम इन दोनों का ही नहीं है। यहां के स्कूलों में सीबीएसई पाठयक्रम लागू है, निजी स्कूलों में भी अधिकतर स्कूलों में सीबीएसई पाठयक्रम लागू है, सीबीएसई के स्तर पर भी अपने पाठयक्रम में सिविक सेंस से जुड़ी शिक्षा देने की कोई गंभीर पहल कभी नहीं हुई है। सरकार और निगम तो अपने स्कूलों के प्रति आंखे मूंदे रहते ही हैं, जबकि निजी स्कूलों का आलम यह है कि उनकी निगाहें पाठयक्रम से ज्यादा स्कूल की छवि व उसके परीक्षा परिणाम पर ज्यादा होती हैं नतीजतन नागरिक जीवन से जुड़े पहलू अनछुए रह जाते हैं।
शहरी विकास मंत्राी डा.ए.के.वालिया से बातचीत
लोग दिल्ली को समझें अपना घर: वालिया
कामनवेल्थ गेम के मद्देनजर दिल्ली वालों को एटीकेट सिखाने व उनका एटीटयूट सुधारने की भी बात की जा रही है क्या दिल्ली वालों का एटीटयूट ठीक नहीं ?
कामनवेल्थ गेम देश के स्वाभिमान व सम्मान से जुड़े हैं, आखिर यह देश का मामला है, विदेशी मेहमानों के साथ कोई छेड़छाड़, अभद्र व्यवहार जैसी घटनाएं होंगी तो इसका गलत प्रभाव पड़ेगा। जहां जहां भी खेल होते हैं वहां विदेशी मेहमानों की सहायता के लिए स्वयसेवकों की फौज बनाई जाती है, यहां भी एैसी फोज तैयार हो तथा आम जनता को भी शिक्षित करना होगा।
लोगों को शिक्षित करने के जो प्रयास हो रहे हैं क्या वह काफी हैं ?
युद्ध स्तर पर काम करना होगा। हम खेल से जुड़ी परियोजनाओं पर तो बल दे रहे हैं लेकिन इस तरफ अभी ध्यान नहीं दिया गया है। अब समय आ गया है कि लोगों को शिक्षित करें ताकि खेलों के दौरान विदेशी मेहमानों के सामने दिल्ली व देश की बेहतर छवि प्रस्तुत हो।
दिल्ली की जनता में एटीटयूट व एटीकेट की कमी का क्या कारण है?
दिल्ली का विकास योजनाबद्ध नहीं हुआ है और यहां की आबादी में भी बड़ी आबादी माइग्रेटिड है। बाहर से लोग आते हैं और जहां जगह मिलती है वहां बसेरा बना लेते हैं। न तो मूलभूत सुविधाएं वहां तक पहुंच पाती हैं और न ही शिक्षा। सरकार अब प्रयास कर रही है, जेजे कलस्टर निवासियों को फ्लैट दिये जा रहे हैं ताकि उनके रहन सहन का स्तर ऊंचा हो, अनाधिकृत कालोनियों को भी नियमित कर वहां सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। जनसंख्या का दबाव भी एक बडी समया है।
ेकामनवेल्थ गेम को देखते हुए दिल्ली के लोगों की सिविक सेंस को आप किस रूप में देखते है ?
सिविक सेंस एक बड़ी समस्या है, इसे निश्चित रूप से सुधारना होगा, इसके लिए नये नियम व कानून भी बनाये जाने की जरूरत है। विदेशों में यदि सिविक सेंस है तो वहां भी धीरे धीरे सुधार हुआ है, वहां नियम तोड़ने पर सजा का प्रावधान भी कड़ा है। सजा के दबाव से भी जागरुकता उत्पन्न होती है।
कड़े नियम कानून बनाने की दिशा में सरकार ने क्या किया है ?
सरकार ने अपनी तरफ से पहल की है। जगह जगह दीवारों पर पोस्टर आदि रोकने के लिए अपना डिफेंसमेंट एक्ट बनाकर कड़ी सजा के प्रावधान किये। अब अपना आबकारी एक्ट बनकर तैयार है जिसमें सड़कों के किनारे शराब का सेवन करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है।
दो एक्ट बना देने से कितनी सफलता मिल सकती है ?
सरकार के हाथ बंधे हैं, एमसीडी एक्ट में भी बड़े संशोधन की जरूरत है, लेकिन दिल्ली सरकार के अधीन एमसीडी न होने के कारण सरकार कुछ कर सकने में सक्षम नहीं है। हम कानून नहीं बना सकतंे। छोटे छोटे काम के लिए भी केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय व गृह मंत्रालय में जाना पड़ता है और बहुत धीमी गति से काम आगे बढ़ते है। निश्चित रूप से काफी सुधार की जरूरत है।
जनता में क्या खामियां देख रहे हैं ?
इसे खामियां नही कहेंगे, जागरुकता की कमी कहेंगे। लोग अपने घर का कूड़ा सड़क पर डालते हैं या फिर नाले में डाल देते हैं जिससे सड़को ंपर गंदगी होती है, नाले व सीवर लाइन जाम हो जाती हैं और फिर उन्हीं लोगों को समस्या होती है, यही उन्हें समझना होगा। जनता को समझना होगा कि दिल्ली उनकी अपनी है, और अपनी दिल्ली को साफ सुथरा उन्हें रखना है, जनता को समझना होगा कि यहां की सम्पत्ति उनकी अपनी सम्पत्ति है जिसे नुकसान न पहुचंाया जाये। लोग दिल्ली को अपना घर समझें और जिस तरह अपने घर को रखते है उसी तरह दिल्ली को सहेज कर रखें।
जनता को जागरुक करने के लिए सरकारी स्तर पर क्या प्रयास किये गये हैं ?
सरकार समय समय पर जागरुकता अभियान चलाती रही है। होली पर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने का अभियान छेड़ा गया तो दीपावली पर पटाखों से प्रदूषण न फैलाने के अभियान चलाये जो काफी सफल रहे।
सिविक सेंस से संबधित दिल्ली की बड़ी समस्या आप क्या देखते हैं ?
सबसे बड़ी समस्या सेनीटेशन और जलभराव की है, इसका कारण यही है कि लोग अपने घर का कूडा कूड़ेदार में डालने के प्रति जागरूक नहीं। कूड़ा नालियों में फंसने के कारण ही जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है। दूसरी बड़ी समस्या प्रदूषण है जिसके लिए सरकार ने लगातार गंभीर पहल कर सभी सार्वजनिक वाहनों को सीएनजी में परिवर्तित किया है और प्रदूषण कम करने के अभियान चलाये हैं।
बिजली व पानी की फिजूल खर्जी भी एक बड़ी समस्या है क्योंकि दिल्ली की बढ़ती आबादी के लिए यूं भी बिजली पानी की कमी महसूस की जा रही है, इस पर क्या कहेंगे ?
बिजली पानी की फिजूलखर्जी एक बड़ी समस्या है लेकिन इससे बड़ी समस्या बिजली चोरी व लीकेज के कारण बेकार होने वाला पानी है। इसे रोकने की जरूरत है।




