शनिवार, 20 दिसंबर 2008

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम

बीआरटी बकोटा साउथ कोलंबिया में बने बीआरटी की तर्ज पर बनी राजधानी में बीआरटी बनाने की योजना
विश्व के 30 से अधिक देशों ने अपनाई बीआरटी परियोजना
चीन, इंडोनेशिया व इक्वाडोर में भी शुरु हुई बीआरटी परियोजना
भारत में वर्ष 2002 में बना हाईकैपिसिटी बस काॅरीडोर की योजना का प्रारूप
यह प्रस्ताव तैयार कराने में आईआईटी के परिवहन विशेषज्ञों की रही विशेष भूमिका
अंबेडकरनगर से दिल्ली गेट तक 14.5 किलोमीटर बीआरटी बनाने का हुआ निर्णय
मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने भी की बीआरटी बनाने की संस्तुति
वर्ष 2005 में मिली आर्थिक वित्तीय कमेटी की सहमति
वर्ष 2006 में निर्माण कार्य हुआ शुरु
निर्माण पर कुल लागत लगभग 200 करोड़
प्रति किलोमीटर पर अनुमानित खर्च 15 करोड़
अब तक बन कर तैयार हुआ अंबेडकर नगर से मूलचंद तक 5.6 किलोमीटर
अभी भी लगभग 9 किलोमीटर का निर्माण है अधूरा

2010 तक 7 कोरीडोर को ईएफसी की मंजूरी
मौजुदा कोरीडोर सहित कुल 7 कोरीडोर बनाने की योजना1 अंबेडकरनगर से मूलचंद 14।5 किमी2। राजेन्द्र नगर से प्रगति मैदान 8 किमी3। जामिया से तिलकनगर 28 किमी4। निजामुद्दीन से नंदनगरी 15 किमी5। मूलचंद से जहांगीरपुरी 27.5 किमी6. कोण्डली से गोकुलपुरी 14 किमी7. शास्त्राीपार्क से करावल नगर 8.5
किमी

दो अन्य कोरीडोर की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार
प्रस्तावित 7 बीआरटी पर अनुमानित खर्च 1819.10 करोड़
राष्ट्रकुल खेलों तक 7 बीआरटी की योजना
सरकार ने राष्ट्रकुल खेलों तक 7 कोरीडोर बनाने की योजना बनाई है। जिनमें एक पर काम चल रहा है तथा बाकी छह के लिए सर्वे पूरा होने के बाद सरकार की व्यय वित्त समिति ने भी 1819.10 करोड़ की मंजूरी दी है। बाकी छह कोरीडोर अंबेडकरनगर से मूलचंद तक14.5 किमी, राजेन्द्र नगर से प्रगति मैदान 8 किमी, जामिया से तिलकनगर 28 किमी, निजामुद्दीन से नंदनगरी 15 किमी, मूलचंद से जहांगीरपुरी 27.5 किमी, कोण्डली से गोकुलपुरी 14 किमी व शास्त्राीपार्क से करावल नगर 8.5 किमी बनाये जाने हैं। इनमें शास्त्राीपार्क करावलनगर कोरीडोर व मूलचंद से जहांगीर पुरी तक 27.5 किलोमीटर के लंबे कोरीडोर की तो विस्तृत परियोजना रिपोर्ट भी बन कर तैयार हो चुकी है।

प्रस्तावित 7 बीआरटी पर अनुमानित खर्च 1819.10 करोड़
2020 तक क्या है योजना
2010 तक 7 बीआरटी 115.5 किलोमीटर
2011-2015 3 बीआरटी 28 किलोमीटर
2016-2020 16 बीआरटी 166.5 किलोमीटर

मौजुदा बीआरटी

हाईकैपेसिटी बस कारीडोर पर दिन भर में होते हैं 200 बसों के ढाई हजार फेरे
व्यस्त समय में प्रति घंटा लगभग 200 बसें गुजरती हैं
काॅरीडोर से जुड़े हैं 50 रूट
4 रूटों की बसें करती हैं पूरे काॅरीडोर का इस्तेमाल
पैदलयात्रियों व साईकिल सवारों के लिए अलग लेन
विकलांगों को विशेष प्राथमिकता
मौजुदा बीआरटी पर पैदल यात्रियों के लिए बने हैं 6 क्रांसिंग
प्रत्येक क्रासिंग पर तैनात हैं मार्शल
अधिकतम 180 सैकेण्ड की होगी रेड लाइट
बस स्टाॅप के लिए है कलर टोन
स्टाॅप से सट कर खड़ी होती हैं बसें

बीआरटी: कामयाबी को लेकर फिर भी सवाल कायम
बीआरटी को लेकर मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित के इरादे ने एक बार फिर बीआरटी की प्रासंगिकता पर बहस खड़ी कर दी है। मुख्यमंत्राी भले ही बीआरटी को जारी रखने का एलान कर चुकी हैं लेकिन असली परीक्षण तो अभी भी होना है। जहां अगले दो वर्ष में 111.5 किलोमीटर के 6 बीआरटी की योजना प्रस्तावित हो वहां मात्रा 5.6 किलोमीटर बीआरटी का विवादित परीक्षण कितना उचित होगा यही बड़ा सवाल है। मुख्यमंत्राी ने मौजुदा बीआरटी के अगले हिस्से में कुछ परिवर्तन करने की बात कही है लेकिन नये परिवर्तनों के बाद भी दिल्ली में बढ़ता यातायात और छोटे वाहनों की बढ़ती संख्या क्या बीआरटी की राह नहीं रोकेगी इसे लेकर संदेह है। फिर राजधानी की सड़कों की चैडाई भी एक बड़ी समस्या है।
अप्रैल माह में जब राजधानी के पहले बस रेपिड ट्रांजिट काॅरीडोर (बीआरटी) को शुरु करने का सपना साकार हुआ तो इसकी सफलता को लेकर भी सवाल खड़े हो गये। जिस उत्साह के साथ सरकार ने बीआरटी परियोजना शुरु की थी वह उत्साह तार तार हो गया और बीआरटी को लेकर बुने गये सपने भी बिखरने लगे। राजधानी में हालांकि अंबेडकर नगर से दिल्लीगेट तक बनने वाले 14.5 किलोमीटर कोरीडोर का पूर्ण निर्माण अभी नहीं हुआ है और प्रथम चरण में अभी केवल 5.6 किलोमीटर काॅरीडोर ही बनकर तैयार हुआ है और इसी पर तमाम परीक्षण हो रहे है।

8 माह में भी खत्म नहीं हुआ परीक्षण

दिल्ली इंटीग्रेटिड मल्टी माॅडल ट्रांजिट सिस्टम (डीम्टस) की परियोजना के तहत राजधानी का पहला बस रेपिड ट्रांजिट काॅरीडोर (हाई कैपिसिटी बस काॅरीडोर) अंबेडकर नगर से दिल्ली गेट तक लगभग 14।5 किलोमीटर लंबा बनाया जाना है। लंबे समय से इस काॅरीडोर का निर्माण कार्य चल रहा है लेकिन निर्माण में लगातार हो रही देरी के चलते गत अप्रैल माह में 5.6 किलोमीटर अंबेडकर नगर से मूलचंद तक लंबा काॅरीडोर ही परीक्षण के लिए शुरु किया गया। पहले बीआरटी के 5.6 किलोमीटर कोरीडोर को 20 अप्रैल को जब परीक्षण के लिए खोला गया था तो कोरीडोर निर्माण में लगे एजेंसियों ने एक सप्ताह के भीतर ही इसका औपचारिक उद्घाटन करने की योजना बनाई थी लेकिन सामने आ रही अनेक समस्याओं के चलते आज तक इसका उद्घाटन नहीं हो सका है और इसे सफल करने के लिए रोजाना नये नये परीक्षण हो रहे हैं। बीते आठ माह में डीम्टस अपने परीक्षण पूरे नहीं कर सका है। सिग्नल,

जाम व वाहनों की संख्या है बड़ी समस्या

मौजुदा बीआरटी पर वाहनों का जाम, वाहनों की बढ़ती संख्या और सिग्नल व्यवस्था बड़ी समस्याएं हैं। कोरीडोर निर्माण में लगे विशेषज्ञों ने कोरीडोर पर जाम की स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञों से सिग्नल अंतराल निर्धारित किया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद प्रत्येक सिग्नल पर वाहनों को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। इसका प्रमुख कारण छोटे वाहनों की भारी संख्या है। बसों को अलग लेन मिलने से जहां बस चालक और बस यात्राी तो खुश हैं लेकिन कार, स्कूटर, मोटरसाईकिल आदि छोटे वाहन चालकों के सामने प्रत्येक सिग्नल पर लंबे इंतजार की समस्या उत्पन्न हो गई है और इस इंतजार को खत्म करने का कोई रास्ता बीते आठ माह में विशेषज्ञ नहीं ढूंढ पाये हैं।

बस और छोटे वाहनों की संख्या

मौजुदा कोरीडोर पर 5.6 किलोमीटर की इस छोटी लंबाई में ही बस लेन पर दिन भर में 200 बसों के लगभग ढाई हजार फेरे लगते हैं जबकि व्यस्त समय में मात्रा आधे घंटे में ही ढाई हजार से अधिक छोटे वाहन कोरीडोर से गुजरते हैं, वाहनों की यही संख्या ही विवाद का कारण है। आलोचकों का तर्क है कि एक ओर दिन भर में बसों के ढाई हजार फेरों के लिए अलग बस लेन और दूसरी ओर मात्रा आधे घंटे में गुजरने वाले ढाई हजार वाहनों के लिए मात्रा एक लेन। अनेक परिवहन विशेषज्ञ जहां इस काॅरीडोर के समर्थन में तर्क देते रहे हैं वहीं काॅरीडोर के विरोधियों का कहना है कि इस काॅरीडोर के निर्माण से सड़कों पर वाहनों की गति तो धीमी हो ही रही है साथ ही छोटे वाहनों की लेन भी संकरी हो रही है।

अब नये परिवर्तन की तैयारी

मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित ने मौजुदा बीआरटी के विस्तार के दौरान कुछ परिवर्तन करने व खामियों को दूर करने की बात कही है। इनमें बड़ा परिवर्तन बस लेन को बीच से हटाकर बांयी ओर लाना है। इसके अलावा सिग्नल, जाम, आदि से संबधित खामियों को भी उन्होंने दूर करने की बात कही है लेकिन बस लेन को बांयी ओर करने में सबसे बड़ा खतरा दुर्घटनाओं का है क्योंकि अक्सर पैदल यात्राी व दुपहिया सवार बांयी ओर ही चलते हैं, अलग बस लेन में दौड़ती तेज रफ्तार बसें दुर्घटनाओं का कारण हो सकती है। इसके अलावा अन्य वाहनों को दायें, बायें मुढ़ने मे ंएक बार फिर सिग्नल समय की नई समस्या सामने आ सकती है।

सवाल हैं कायम

इस काॅरीडोर की सफलता को लेकर जो सवाल इसका निर्माण शुरु होने से पहले उठ रहे थे वह आज भी कायम है, एक परीक्षण तो राजधानी की जनता देख चुकी है अब मौजुदा कोरीडोर के दूसरे चरण को भी नये परिवर्तनों के साथ जारी रखने का एलान हो ही चुका है, क्या दूसरे चरण में संबधित विभाग व सरकार की नाक बचेगी इसे लेकर कयास लगाये जा रहे है।

मौजुदा कोरीडोर से जुड़ी हैं 50 रूटों की बसें

अप्रैल माह से शुरु हुए राजधानी के पहले बस काॅरीडोर के 5।6 किलोमीटर हिस्से से 50 रूटों की 200 बसें जुड़ी हैं जो कोरीडोर के किसी न किसी हिस्से से होकर गुजरती है। अभी तक मात्रा 4 रूटों की बसें ही इस पूरे कोरीडोर का इस्तेमाल कर रही है। रूट संख्या 419, 423, 521 तथा 522 रूटों की बसें मौजुदा काॅरीडोर का पूरा इस्तेमाल कर रही है। व्यस्त समय के दौरान काॅरीडोर पर प्रति घंटा 75 से 200 बसें दौड़ती है। कोरीडोर में पैदल यात्रियों व साईकिल सवारों के लिए अलग लेन है तथा सड़क पार करने के लिए पैदल यात्रियों के लिए 6 जेब्रा कासिंग हैं जहां पर पर वर्दीधारी मार्शल तैनात किये गये हैं। बसों के लिए बनाये गये प्लेटफार्म कलर टोन पर आधरित है तथा प्लेटफार्म पर जीपीएस सुविधा भी है ताकि यात्रियों को आने वाली बस की सूचना मिल जाये।


क्या है बीआरटी
बस रेपिड ट्रांजिट एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सड़क पर बसांे की रफ्तार को कायम रखने के लिए बसों को अलग लेन दी जाती है। बीआरटी का मुख्य मकसद सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना तथा निजी वाहनों के प्रयोग को कम करना है। इसके पीछे परिकलपना यह है कि यदि बसें निर्विघ्न अपनी लेन में दौड़ती रहेंगी तो यात्री अपने वाहनों का प्रयोग करने के लिए गंतव्य तक जाने के लिए बसों का प्रयोग करेंगे। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए उठाये जा रहे कदमों मैट्रो रेल, मोने रेल, ट्रामा आदि की श्रंखला में ही बीआरटी की कल्पना की गई है।

बुधवार, 10 दिसंबर 2008

आखिर भाजपा क्यों नहीं जीत सकी दिल्ली का दिल

कहां हुई भूल, क्यों नहीं खिला फूल

कहीं भूल, कहीं गलती और कहीं अति आत्मविश्वास बना हार का कारण
दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
टिकट वितरण में हुई मनमानी
पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय साबित हुआ गलत
जनाधार वाले स्थानीय नेताओं की हुई उपेक्षा
परिसीमन के दौरान निष्क्रियता से ही शुरु हुआ हार का सफर
संगठन चुनाव में चहेतों को बांटे पद
आम कार्यकर्ता संगठन से हुआ दूर
अनिवासियों की ताकत को नहीं समझ पाई भाजपा
पार्टी के दिग्गजों की चिंता रही सिर्फ चहेतों को जिताने पर
अनेक गलत फैसले पड़े भारी
प्रत्याशियों के पास थी कार्यकर्ताओं की कमी
स्टार प्रचारकों की सभाओं में भी उलझे रहे प्रत्याशी व कार्यकर्ता
मुद्दों का सही चयन नहीं कर पाये चुनाव मैनेजर
जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन नहीं चला
मुख्यमंत्री पद पर मल्होत्रा को भी स्वीकार नहीं कर पाये मतदाता
अंत तक उठते रहे बगावत के स्वर
बसपा ने ही बचाई लाज
अनाधिकृत कालोनियों को सर्टीफिकेट पडे महंगे

संजय टुटेजा
अब मंथन होगा, हार का मंथन, कहां तो शानदार जीत और सरकार बनाने के सपने और कहां शर्मनाक हार। एैसी हार जिसने भाजपा के चुनाव मैनेजरों को शर्मसार कर दिया है। पार्टी के दिग्गज आज नजरे चुरा रहे हैं, नजरें मिलाएं भी तो कैसे, आखिर अंतिम समय तक आत्मविश्वास से लबरेज जीत के नगाड़े पीटे जा रहे थे। अब कोई मुद्दो को गलत बताकर अपना बचाव कर रहा है तो कोई चुनाव प्रबंधन और टिकट वितरण को हार का जिम्मेदार मान रहा है। इन मैनेजरों के पास तो अब भी बचाव के पचास बहाने हैं लेकिन आम कार्यकता इस हार से आहत है। कार्यकर्ताओं की पीड़ा यह है कि मात्रा एक महिला शीला दीक्षित से एक पूरा संगठन हार गया। कार्यकर्ताओं की जबान परं बस एक ही सवाल है कि जब एक महिला एक पूरी पार्टी को विजयी बना सकती है तो फिर एक पूरी पार्टी और तमाम स्टार प्रचारक दिल्ली का दिल क्यों नहीं जीत सके।
अब फिर शुरुआत होगी, सत्ता के सफर की नई शुरुआत और पांच वर्ष का लंबा इंतजार। प्रदेश भाजपा के तमाम दिग्गज अब हार के मंथन और विशलेषण की बात कर रहे हैं, मंथन तो पिछली हार के बाद भी हुए थे और विशलेषण कर कमियां भी ढूंढी गई थी लेकिन फिर गलतियां हुई, फिर भीतरघात हुई, फिर मनमानी हुई और एक बार फिर निश्चित जीत के सपने भी देखे गये। सपनों को साकार करने की पहल न तो 1998 की हार के बाद शुरु हुई और न ही वर्ष 2003 की हार के बाद शुरु हुई, आज आम कार्यकर्ताओं का यही कहना है कि यदि पार्टी ने सचमुच दिल्ली का दिल जीतने की कोई पहल पिछले दस वर्षो में की होती तो निश्चित रूप से पार्टी के तमाम दिग्गज आज इस शर्मनाक हार पर शर्मसार न होते। जिन विधानसभा सीटों पर भाजपा अपनी साख बचाने में कामयाब रही है वहां का आम कार्यकर्ता भी पार्टी के भीतर बढ़ती सामंतवादी प्रवृति से दुखी है। एक अनुशासित पार्टी के कार्यकर्ताओं की टीस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश मुख्यालय पर आज बुराड़ी की एक महिला कार्यकर्ता की आंखों में बुराड़ी की जीत पर खुशी नहीं बल्कि अपने नेताओं की मनमानी को लेकर गुस्सा और चेहरे पर टीस थी।
आम कार्यकर्ता की जबान पर जो सवाल हैं उनमें से किसी का जवाब पार्टी व इस चुनाव के मैनेजरों के पास नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष डा.हर्षवर्धन बस यह कह कर चुप हो जाते हैं कि ‘एैसी उम्मीद नहीं थी’ तो उधर चुनाव के प्रमुख मैनेजर अरुण जेटली साफगोई से हार की जिम्मेदारी ले रहे हैं लेकिन कार्यकर्ता यह पूछ रहे हैं कि क्या दिग्गजों के यह बयान पार्टी का कुछ भला कर पायेंगे। कांग्रेस की दस वर्षो की सत्ता के बावजूद न तो इनकमबैंसी का असर और न ही सरकार के प्रति जनता की नाराजगी का कोई असर। आखिर सरकार की खामियों को क्यों नहीं भुना पाई भाजपा, इसके एक नहीं अनेक कारण है और अब आम कार्यकर्ता इन्हीं कारणों का पोस्टमार्टम चाहता है।

परिसीमन से ही शुरु हो गई थी हार
विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की शुरुआत तो परिसीमन से ही हो गई थी। परिसीमन के दौरान ओपी कोहली व प्रो।विजय कुमार मल्होत्रा को परिसीमन में भाजपा की राय रखने की जिम्मेदारी पार्टी ने दी थी लेकिन 70 विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन कांग्रेस नेताओं के प्रस्ताव पर हो गया और भाजपा की ओर से प्रस्ताव तक तैयार नहीं किया गया, नतीजतन कांग्रेस के नेताओं ने विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन अपनी जीत के समीकरणों के अनुसार कराया।

दस वर्ष में नहीं विकसित हुआ मजबूत नेतृत्व
दस वर्ष पूर्व प्रदेश में भाजपा सरकार के पतन के बाद भाजपा प्रदेश में कोई एैसा बड़ा नेता विकसित नहीं कर पाई जिसकी दिल्ली की आम जनता तक पकड़ हो। पार्टी के कार्यकर्ताओं को पूर्व मुख्यमंत्राी मदनलाल खुराना जैसे नेता की कमी आज भी खलती है। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज व मुख्यमंत्राी पद के उम्मीदवार प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा जैसे नेता तो हुए लेकिन इनमें से किसी भी नेता ने दिल्ली को अपना कर्मक्षेत्रा नहीं बनाया और राष्ट्रीय राजनीति में ही अपना भविष्य तलाशने की कोशिश की। पिछले पांच वर्ष में प्रदेश स्तर पर डा.हर्षवर्धन, विजय गोयल व प्रो.जगदीश मुखी अपना कद इतना ऊंचा नहीं कर सके कि वह सर्वमान्य नेता बन सकें। जनता को जोड़ने के लिए कोई बड़ा जनांदोलन भी प्रदेश भाजपा पिछले दस वर्ष में नहीं चला सकी।
प्रत्याशियों के चयन पर सवाल
विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जो उम्मीदवार उतारे उनमे अधिकतर एैसे थे जिन्हें या तो किसी दिग्गज से दोस्ती का इनाम टिकट के रूप में मिला था या किसी को जी हजूर का ईनाम टिकट के रूप में मिला था। प्रत्याशियों के चयन हेतु गठित चयन समिति के अधिकतर सदस्य स्वयं कोई सुझाव देने के बजाय अपने टिकट के लिए स्वयं मल्होत्रा, जेटली व प्रदेश अध्यक्ष की जी हजूरी करते रहे। मल्होत्रा, जेटली और हर्षवर्धन की तिकड़ी संभावित जीत देख रही थी और अपने अधिक से अधिक चहेतों को विधानसभा में पहुंचाने की जुगत में रही।
गलत फैसले भी बने हार का कारण
भाजपा नेतृत्व अब दिल्ली में हार के मंथन के दौरान हार का दोष जिस पर भी मढ़े लेकिन हार का कारण नेतृत्व के गलत फैसले भी थे। एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि मुख्यमंत्राी पद पर प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा का चयन पार्टी का गलत फैसला था तो पार्टी के ही कई नेता पार्टी द्वारा उठाये गये मुद्दों को भी गलत बताते हैं। उनका कहना है कि स्थानीय समस्याओं से जुड़े मुद्दे उठाने के बजाय राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह दी गई। अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में कमजोर व नये प्रत्याशी होने के कारण प्रत्याशियों के साथ आम कार्यकर्ता ही नहीं जुड़ा जिन क्षेत्रों में कार्यकर्ता सक्रिय भी हुए वहां स्टार प्रचारकों में उलझे रहे। पार्षदों को टिकट न देने का निर्णय भी पार्टी के मैनेजरों पर भारी पड़ा। यदि जीतने में सक्षम पार्षदों को टिकट दिया जाता तो स्थिति विपरीत हो सकती थी।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

कांग्रेस के हाथ पर हाथी का पांव

सोनिया ने की जनादेश की अपील तो माया ने किया इंकलाब का एलान

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली की जनता को विकास का वास्ता तो दिया है लेकिन विकास और उपलब्धियों से सजे कांग्रेस के हाथ पर आज बसपा का हाथी जिस तरह पांव रख कर दौड़ता दिखाई दिया है उससे कांग्रेस की मुश्किले बढ़ती दिखाई दे रही हैं। आज हुई सोनिया गांधी और मायावती की रैलियां भीड़ की दृष्टि से भले ही समान रही हों लेकिन सोनिया की रैली में केवल उपलब्धियों का वास्ता, जनादेश की अपील और मतदाताओं से गुजारिश थी तो मायावती की रैली सचमुच इंकलाब का एलान थी। चुनाव प्रचार के इस अंतिम दौर में आज दो महारथी एक साथ इंकलाब करने के लिए मैदान में थे। एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी बाहरी दिल्ली में हाथ उठाकर दिल्ली की जनता को विकास का वास्ता दे रही थी तो दूसरी और पूर्वी दिल्ली में हाथी पर सवार बसपा सुप्रीमों मायावती मानों कांग्रेस और भाजपा का किला भेदने आई थी। इस किले को भेदने के लिए मायावती ने अपने तरकस से अनेक तीर चलाये। आम जनता और दिल्ली से जुड़ा प्रत्येक मुद्दा मानों उनका अस्त्रा बनकर उनकी जबान पर था। प्रचार के इस दौर में कांग्रेस नेे बसपा के इन तीरों का भले ही गंभीरता से न लिया हो लेकिन बसपा के इन तीरों में आज ईवीएम मशीनों को भेदने की ताकत भी दिखाई दी। मायावती की रैली जहां दिल्ली में जगह बनाने की जुझारू कोशिश थी तो सोनिया की रैली दिल्ली में अपनी जगह बचाने की एक कवायद भर थी। सोनिया की रैली में जनता से जुड़े मुद्दे थे तो मायावती की रैली में क्रांति के स्वर थे। दोनों ही रैलियों में अनेक भिन्नताएं थी लेकिन एक समानता थी, दोनों ही रैलियों में इन पार्टियों के बाकी नेता अपने सुप्रीमों के सामने बौने दिखाई दे रहे थे। यदि रैलियों में उमड़ी भीड़ की दृष्टि से तुलना की जाये तो दोनों रैलियों में लगभग एक समान भीड़ थीे लेकिन इसके बावजूद बसपा के लिए इस रैली को उपलब्धि कहा जा सकता है क्योंकि दिल्ली में बसपा का न तो कांग्रेस की तरह कभी जनाधार रहा है और न ही संगठन की दृष्टि से भी बसपा कांग्रेस की तरह मजबूत यहां है, एैसे में कांग्रेस को चुनावी रैली में बराबर की टक्कर देकर मायावती ने निश्चित रूप से आगामी चुनाव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान देने का अहसास करा दिया है। हालांकि दिल्ली में हाथी की आहट तो निगम चुनाव में ही दिखाई देने लगी थी लेकिन सोशल इंजीनियरिंग के जिस फार्मूले को मायावती ने दिल्ली में भी अपना प्रमुख शस्त्रा बनाने की घोषणा की है उससे इतना निश्चित है कि हाथी की आहट ही कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब है।

बुलंद इरादों की राह पर सपनों को साकार करने की चाह

बुलंद इरादों की राह पर सपनों को साकार करने की चाह

जोश भी, उत्साह भी उल्लास भी, मस्ती भी

वहां उल्लास भी है, उत्साह, मस्ती, जोश और सपनों को साकार करने का जजबा भी है। उनके घर के आंगन की हरी घास पर आज सूर्य की पहली किरण के बाद से ही शुरु हुआ उनके दिन का सफर मानों उनके बुलंद इरादों की कहानी कह रहा था। आंगन में चिड़ियों की चहचाहट और भीतर लगातार घनघनाती फोन की घंटी से बेखबर वेटिंग इन सीएम प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा शायद अपने लक्ष्य से बेखबर नहीं थे, तभी तो उनका पल पल मानों खुद ही मंजिल की ओर बढ़ रहा था। कभी चारों और से घेरे कार्यकर्ता, कभी मीडिया के सवाल और कभी बीच सड़कों पर आम जनता के साथ रोड शो, न केाई तनाव, न कोई शिकन, बस लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम। सवेरे साढ़े छह बजे से शुरु हुए वेटिंग इन चीफ प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा के साथ इस सफर में दिन भर की दौड़ के बावजूद देर शाम तक भी मल्होत्रा के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। सुबह सवेरे की ठंडक के बीच हल्के व्ययाम व योगा के साथ जब उन्होंने दिन की शुरुआत की तो ठंड के बावजूद उनके आंगन में चुनाव की गर्मी दिखाई दे रही थी। चाय की चुस्कियों के साथ ही उन्होंने अखबारों की सुर्खियां देखी और फिर एक घंटे के भीतर ही अपने दैनिक कार्यो को पूरा कर भाजपा का यह विजय अपनी विजय के अभियान पर निकल पड़ा। पंचशील में विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता उनका इंतजार कर रहे थे, लगभग 11 बजे मल्होत्रा जैसे ही वहां पहुंचे तो वातावरण जिंदाबाद के नारों से गूंज उठा। यहां उन्होंने केवल भाषण ही नहीं दिया बल्कि कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रबंधन की सीख भी दी। कार्यकर्ताओं की यह कक्षा लेकर मल्होत्रा साढ़े बारह बजे जब अपने आवास पर पहुंचे तो वहां दिल्ली का मीडिया उनके इंतजार में था। मीडिया से बातचीत का मुद्दा तो बीआरटी कारीडोर था लेकिन मीडिया ने जो भी सवाल दागे उन्होंने मीडिया को संतुष्ट करने में कसर नहीं छोड़ी। मीडिया के साथ हुई इस चर्चा के बाद उनके जहन में शायद चुनाव प्रबंधन की चुनौतियां और चुनावी मुद्दे थे, तभी तो एक नई चर्चा के लिए वह सीधे पहुंचे पार्टी नेता अरुण जेटली के पास, जहां लगभग आधे घंटे की राजनीतिक चर्चा के बाद दोपहर के भोजन के लिए एक बार फिर वह अपने आवास पर पहुंचे जहां उनकी पत्नी के साथ साथ उनकी बेटी अनुपमा भी शायद पापा के साथ लंच करने का इंतजार कर रही थी। अनुपमा ने मुस्कुराहट के साथ अपने पापा का स्वागत किया तो मल्होत्रा का चेहरा खिल उठा। दिन के दूसरे पहर में शुरु हुआ मल्होत्रा का रोड शो, एक एैसा रोड शो जिसे देखकर मल्होत्रा भी गदगद थे और उनके चाहने वाले भी गदगद। इस रोड शो की शुरुआत हुई पंचशील विहार स्थित त्रिवेणी अपार्टमेंट से। लगभग साढ़े चार बजे मल्होत्रा जब यहां पहुंचे तो 500 से अधिक लोग हाथों में फूलों के हार लिए उनके स्वागत पर मौजूद थे। मल्होत्रा एक खुली जीप में सवार हुए और यह काफिला जब आगे बढ़ा तो चारों और से मल्होत्रा जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे। कहीं छतों से महिलाएं फूल बरसा रही थी तो कहीं बुजुर्ग महिलाएं उनकी जीप के आगे आकर आशीर्वाद के हाथ उठा रही थी। पंचशील के सभी ब्लाकों में घुमते हुए वह जिस ब्लाक में भी प्रवेश करते ब्लाक के शुरु में ही वहां के कार्यकर्ता गर्मजोशी के साथ उनका स्वागत करते। शाम छह बजे इस काफिले ने आर ब्लाक से खिचड़ी एक्सटेंशन में प्रवेश किया और इसके बाद जे ब्लाक सहित अन्य ब्लाकों व गुप्ता कालोनी में इस रोड शो में उनके समर्थकों की संख्या बढ़ती गई। इस बीच उत्साही कार्यकर्ताओं ने उन्हें सब्जियों से भी तोला। देर शाम कृष्णा मंदिर में उनका यह रोड शो समाप्त हुआ। इसके बाद भी उनके चेहरे पर थकान नहीं थी और वह चल दिये एक नई सभा के लिए चितरंजन पार्क। वहां चुनावी सभा के बाद 9 बजे एक बार फिर उन्होंने कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रबंधन के गुर दिये। रात दस बजे वह घर लौटे तो आज की ही तरह अगले दिन के व्यस्त शैडयूल उनकी टेबल पर था।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

यमुना बोली, मुझे और न करो मैली





जीवन दायिनी का जीवन संकट में



वजीराबाद से ओखला बैराज तक 22 किलोमीटर का सफर दिल्ली में तय करती है यमुना
एनसीआर में कुल 50 किलोमीटर है यमुना की लंबाई



यह है प्रदूषण का कारण

दिल्ली के विभिन्न इलाकों से 22 प्रमुख नाले गिरते हैं यमुना मेंप्रतिदिन 50 से 60 मिलियन गैलन औद्योगिक कचरा गिरता है यमुना के आंचल में
लगभग 700 गैलर घरेलू सीवेज प्रतिदिन करता है यमुना को बदरंग

1376 किलोमीटर की लंबाई में सर्वाधिक 79 प्रतिशत प्रदूषण यमुना को मिलता है दिल्ली से
प्रदूषण के लिए यमुना के भीतर होने वाली खेती भी है जिम्मेदार



यमुना एक्शन प्लान भी नहीं सुधार सका यमुना की दुर्दशा


पहले चरण में दिल्ली में ही 166 करोड़ रुपये हुए यमुना की सफाई पर खर्च
दूसरे चरण में भी ५०० करोड़ से अधिक खर्च होने का है अनुमान



प्रदूषण मुक्त करने की नई योजाना


यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए अब जल बोर्ड ने बनाई इंटरसेप्टर व डाइवर्जन योजनासप्लीमेंट्री ड्रेन, नजफगढ़ ड्रेन व शाहदरा ड्रेन के मुहाने पर लगेंगे ट्रीटमेंट प्लांट
तीनों ड्रेन के समानान्तर सीवेज के लिए बिछेगी पाइप लाइन
पाइप लाइन से सीवेज पहुंचेगा ट्रीटमेंट प्लांट में
ट्रीटमेंट के बाद ही पानी जायेगा यमुना में
योजना पर अमल के लिए इंजीनियर इंडिया से हुआ अनुबंध
पुराने ट्रीटमेंट प्लांटों का होगा जीर्णोद्धार



यमुना को प्रदूषित करने वाले प्रमुख नालों से होने वाला प्रदूषण


नाला मिलियन गैलन(बीओडी)


नजफगढ़ नाला 148


मेटकाफ हाउस ५८


खैबर पास 10स्वीपर कालोनी ११०


मैगजीन रोड 240आईएसबीटी ड्रेन ११६


तांगा स्टेंड 130सिविल मिल 2१०


पावर हाउस 180डा.सेन नर्सिंग होम १७०


ड्रेन 14 16बरापुला 52महारानी बाग १०


0कालकाजी 22सरिता विहार ९४


तेखण्ड 64तुगलकाबाद 112एलपीजी प्लांट ६६


सरिता विहार पुल 39साहिबाबाद 230इन्द्रापुरी 2१०


(उक्त आंकड़े डीपीसीसी द्वारा मई 07 में लिए गये सेम्पल पर आधारित हैं)



यमुना नदी दिल्ली के करोड़ो लोगों की जीवन दायिनी है लेकिन अब देश की पुरातन परंपराओं, आस्थाओं व धार्मिक मान्यताओं की प्रतीक यमुना नदी जीवन दायिनी होकर भी स्वयं अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। करोड़ो लोगों की गंदगी, मल मूत्र, उद्योगों का कचरा और तमाम जहरीले कैमिकल अपने में समाहित करने के बाद भी यह राजधानी के आधे से अधिक लोगों की प्यास बुझा रही है। निरंतर बढ़ती गंदगी के बावजूद राजधानी को मिलने वाले पेयजल की 56 प्रतिशत पूर्ति यमुना ही करती है। लेकिन विडंबना यह है कि दिल्ली के जिन करोड़ों लोगों को यह जीवन दे रही है वही इस अभागी का जीवन लेने पर तुले हैं। यमुनौत्राी से अपने अंतिम पड़ाव तक यूं तो यमुना का सफर 1376 किलोमीटर लंबा है लेकिन राजधानी दिल्ली में यमुना 22 किलोमीटर और एनसीआर में 50 किलोमीटर सफर तय करती है। यह यमुना की कुल लंबाई का मात्रा 2 प्रतिशत है लेकिन यह दुर्भाग्य यह है कि यमुना के 1376 किलोमीटर लंबे सफर में यमुना को मिलने वाली गंदगी का 79 प्रतिशत उसे दिल्ली से मिलता है। यमुना का सफर दिल्ली में वजीराबाद बैराज से शुरु होता है और 22 किलोमीटर बाद ओखला बैराज पर खत्म होता है। इसे डाउन स्ट्रीम बोला जाता है, अप स्ट्रीम पाल्ला बैराज से शुरु होता है यह 28 किलोमीटर का सफर है। दिल्ली में प्रवेश करते ही दिल्लीवासी जहर पिलाकर मां यमुना का स्वागत करते हैं और उसके बाद तो 22 किलोमीटर के सफर में र कदम कदम पर जहर का एैसा सैलाब इसमें समाहित होता है कि यमुना की पवित्राता स्वयं पर शर्माने लगती है। प्रदूषण नियंत्राण व पर्यावरण संस्थाओं के आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन लगभग 60 गैलर औद्योगिक कचरा दिल्ली से यमुना में समाहित होता है और लगभग 700 मिलियन घरेलू सीवेज प्रतिदिन यमुना में समाहित होकर यमुना को गंदा नाला बना देता है। धार्मिक आस्थाएं व मान्यताएं भी यमुना के जहर में और अधिक जहर घोल रही हैं। विभिन्न पर्वो व त्यौहारों पर हजारो टन धार्मिक अनुष्ठानों की सामग्री यमुना में बहा दी जाती है जिसमें अलग अलग कैमिकल होने के कारण यमुना में जहरीले तत्वों की मात्रा में बढ़ोत्तरी होती है। इस स्थिति से निपटने में सामने सरकार भी बेबस है। वार्षिक पर्वो त्यौहारों पर ही नहीं बल्कि प्रतिदिन भारी मात्रा में धार्मिक अनुष्ठानों की सामग्री यमुना में प्रवाहित कर दी जाती है। यूं तो सरकार का प्रदूषण नियंत्राण विभाग नियमित रूप से यमुना जल के नमूने एकत्रा कर प्रदूषण व यमुना में फैले जहरीले तत्वों की मात्रा का परीक्षण करता है लेकिन इस परीक्षण की रिपोर्ट केवल प्रयोगशालाओं में ही पड़ी रहती है। सरकार की ओर से योजनाएं तो बनाई जाती हैं, लेकिन योजनाओं के अमल में इतने पेच होते हैं कि योजना पूरी होने से पूर्व यमुना के प्रदूषण को एक नई योजना की जरूरत होती है। यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए वर्ष 1993 में यमुना एक्शन प्लान बनाया गया, जिसमें दिल्ली में ही लगभग 160 करोड़ रुपये बहा दिये गये लेकिन स्थिति बद से बदतर हो गई है। इसके अलावा दिल्ली जलबोर्ड, डीडीए व बाढ़ नियंत्राण विभाग भी प्रतिवर्ष लगभग
आम जनता की जागरुकता जरूरी
जब तक आम जनता अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लायेगी तब तक यमुना को प्रदूशण से मुक्त नहीं किया जा सकता। आज यदि यमुना में जहर घुल रहा है तो इसका कारण आम जनता की लापरवाही अधिक है। सरकार को तो योजनाएं ही बनानी है और सरकार की योजनाओं पर काम भी शुरु हो जाता है लेकिन जब तक आम जनता का सहयोग नहीं होगा तब तक प्रदूषण कैसे खत्म होगा। सरकार की तमाम योजनाओं को आम जनता ही ठप कर रही है। यमुना दिल्ली की लाइफ लाइन है, यह दिल्लीवासियों को समझना होगा और अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा। एस.ए.नकवी कन्वीनर, सिटीजन फ्रन्ट फार वाटर डेमोक्रेसी


यमुना को उसके हाल पर छोड़ दें
यमुना को प्रदूषण से मुक्त करने के यमुना को उसके हाॅल पर छोड़ दें। बस, यमुना से छेड़छाड़ बंद हो जाये। यमुना अपनी सफाई में खुद सक्षम है। यमुना को यमुना के हाल पर छोड़ दिया जाये तो प्राकृतिक रूप से वह स्वयं अपना उपचार कर लेगी लेकिन इसमें जिस तरह गंदगी के नाले डाले जा रहे हैं उन पर रोक लगे। इसमें डाले जा रहे नाले यह सबसे बड़ा कारण है। एक सामानान्तर नाला बने और ट्रीटमेंट कर के ही पानी यमुना में मिलाया जाये। आस पास पेड़ पौधे लगा दे बजाय कंकरीट का जंगल बनाने के। प्राकृतिक जंगल जरूरी है। यमुना को साफ करने के लिए करोड़ो रूपये की योजनाओं पर तरीके से काम हो तो सुधार हो सकता है। एनएन मिश्रा, संयोजक यमुना सत्याग्रह

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल

कांग्रेस के लिए मुसीबत बना नेताओं का पुत्रा मोह
एक दर्जन से अधिक नेताओं के पुत्रा टिकट की कतार में
ये ही तो हैं गुदड़ी के असली लाल

नई दिल्ली 11 अक्टूबर।
लाली मेरे लाल की जित देखो तित लाल, कांग्रेस के दर्जनों नेताओं को आजकल अपने लाल की लाली के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। अपने लाल को ही गुदड़ी का असली लाल बताने वाले यह नेता किसी भी तरीके से उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट दिलाने की जुगत में हैं। उम्मीदवारों के चयन में उलझी कांग्रेस के लिए नेताओं का यह पुत्रा मोह संकट बन गया है। इसके अलावा किसी नेता की पुत्रावधू और किसी की साली भी टिकट की कतार में है।
कांग्रेस में विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया शुरु होने के साथ ही कई गुदड़ी के लाल अपने पिता की विरासत और कद का सहारा लेकर विधानसभा में पहुंचने का सपना देख रहे हैं। कुछ नेता तो अपने पुत्रों को टिकट दिलाने के लिए पार्टी में अपने पुराने सम्पर्को का सहारा लेकर तार से तार जोड़ रहे हैं तो कई दिवंगत नेताओं के पुत्रा अब पिता की कुर्बानियों व सेवाओं का प्रतिफल चाहते हैं। यही नहीं कुछ नेताओं के अन्य रिश्तेदार भी टिकट की दावेदारी कर रहे हैं और पार्टी हाईकमान के लिए बड़ा संकट बने हुए हैं।
विधानसभा अध्यक्ष चै.प्रेम सिंह के पुत्रा प्रमोद चैधरी देवली विधानसभा क्षेत्रा से टिकट के दावेदार हैं। चै.प्रेम सिंह विधानसभा अध्यक्ष होने के साथ साथ पार्टी के अनुभवी व वरिष्ठ नेता हैं, निश्चित रूप से पार्टी उन्हें भी चुनाव लड़ायेगी, एैसे में उनके पुत्रा की दावेदारी को लेकर पार्टी पसोपश में है। पूर्व गृहमंत्राी ओम मेहता के पुत्रा राजेश मेहता कस्तूरबा नगर विधानसभा सीट से दावेदार हैं जबकि पूर्व केन्द्रीय मंत्राी बी.पी.मौर्या की पुत्राी अमूल्या मौर्या गोकुलपुरी सीट से टिकट की दावेदार हैं। पूर्व सांसद चै.दलीप सिंह के एक नही दो पुत्रा सुरेन्द्र सिंह व सुखवीर सिंह के अलावा उनकी एक पुत्रा वधू जयश्री पंवार भी टिकट की दावेदार हैं। मजे की बात यह है कि तीनों एक ही सीट जीके पार्ट 1 से टिकट मांग रहे हैं।
इसी प्रकार पूर्व सांसद भीखूराम जैन के पुत्रा नरेन्द्र भीखू राम चांदनी चैक विधानसभा सीट से दावेदारी कर रहे हैं तो इसी सीट से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बृजमोहन शर्मा के पुत्रा विजय मोहन भी दावेदार हैं। पार्टी संकट में है किसे महत्व दे और किसे न दे। पार्टी के एक अन्य पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश शर्मा के पुत्रा राहुल शर्मा भी टिकट की कतार में हैं वह मालवीय नगर विधानसभा से टिकट मांग रहे हैं। पूर्व कार्यकारी पार्षद किशन स्वरूप का बेटा महेन्द्र कुमार मादीपुर सीट से दावेदार है जबकि पूर्व मंत्राी व पूर्व महापौर महेन्द्र सिंह साथी का पुत्रा गुरजीत सिंह साथी तिलक नगर व राजौरी गार्डन से दावेदारी कर रहे हैं। साथी को उम्मीद है कि पार्टी उन्हें उनके पिता की सेवाओं का प्रतिफल देगी।
पुत्रों के अलावा नेताओं के अन्य संबधी भी टिकट की लाइन में हैं। पूर्व महानगर पार्षद चै.हीरा सिंह की बेटी तथा प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्राी डा.योगानंद शास्त्राी की साली श्रीमती सुदेश सांगवान दिल्ली कैंट या पालम विधानसभा क्षेत्रा से टिकट मांग रही हैं जबकि विधायक महाबल मिश्रा के भाई हीरा मिश्रा जनकपुरी विधानसभा क्षेत्रा से अपनी दावेदारी कर रहे हैं। कुछ पुराने नेता एैसे भी हैं जो खुद टिकट की लाइन में हैं जिनमें मैट्रोपोलोटीन काउंसिल के पूर्व स्पीकर पुरुषोत्तम गोयल अपने लिए माडल टाऊन सीट से तथा पूर्व सांसद चै.तारीफ सिंह किराड़ी विधानसभा सीट से दावेदारी कर रहे हैं।

आडवाणी की रैली में चुनावी शंखनाद की औपचारिक गूंज

बस हो गया चुनाव का शंखनाद। चुनावी महाभारत का भाजपा की ओर से शायद यह औपचारिक शंखनाद था। भाजपा द्वारा आज आयोजित ‘विजय संकल्प रैली’ से हालांकि आम जनता दूर थी लेकिन रैली में आडवाणी की मौजुदगी कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए काफी थी। रैली के माध्यम से पार्टी नेतृत्व ने विभिन्न मुद्दे उठाकर कांग्रेस को घेरने की कोशिश तो की ही साथ ही पार्टी के विभिन्न नेताओं की आपसी एकता का संदेश भी कार्यकर्ताओं को दिया।
प्रदेश भाजपा द्वारा आयोजित इस विजय संकल्प रैली का आयोजन किसी बड़े मैदान में न कर वीपी हाऊस के छोटे परिसर में किया गया। इस रैली में पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया था ताकि आगामी चुनाव के मद्देनजर उन्हें सक्रिय कर उत्साह भरा जा सके निश्चित रूप से आडवाणी की मौजुदगी से कार्यकर्ताओं का जोश और उत्साह हिलौरें ले रहा था और पार्टी अपने इस उद्देश्य में कामयाब भी दिखाई दी। रैली में न तो आम जनता की भागीदारी थी और न ही बड़ी रैलियों जैसा उत्साह और वातावरण।
हालांकि यह माना जा रहा था कि चुनाव से पूर्व पार्टी राजधानी में कोई बड़ी रैली कर चुनावी शंखनाद करेगी लेकिन जिस तरह आडवाणी की इस रैली को प्रदेश भाजपा आम जनता से नहीं जोड़ पाई उससे आडवाणी के चुनावी शंखनाद की गूंज भी औपचारिक होकर रह गई। पार्टी के भीतर ही इस रैली को सीमित स्तर पर करने को लेकर मतभेद था। कुछ नेता चाहते थे कि रैली भले ही कुछ दिन बाद हो लेकिन विशाल स्तर पर रैली की जानी चाहिए ताकि आम जनता के बीच सरकार के काले चिट्ठों की पोल खोली जा सके।
आज की यह रैली समूची पार्टी का मुख्यमंत्राी पद के उम्मीदवार प्रो.विजय कुमार मल्होत्रा को समर्थन भी साबित हुई। रैली के माध्यम से यह भी संदेश देने की कोशिश की गई कि प्रो. विजय कुमार मल्होत्रा की मुख्यमंत्राी पद की उम्मीदवारी पर पार्टी के सभी नेता एक राय से पार्टी के साथ हैं। रैली में जिस तरह सभी नेताओं ने दिल्ली से जुड़े मुद्दे उठाते हुए प्रदेश सरकार की नाकामियों को उजागर किया उससे यह रैली कांग्रेस व सरकार पर पहला चुनावी हमला भी साबित हुई। यहां तक कि आडवाणी ने भी दिल्ली को विश्व की सर्वोत्तम राजधानी बनाने तथा आम जनता की मूलभूत समस्याओं से संबधित मुद्दे उठाये।

चुनाव के आगाज पर ही बिखर गई उम्मीदें

आगाज तो चुनाव का था लेकिन उम्मीदें बिखर गई। इसे पार्टी की भीतरी गुटबाजी कहें या फिर कोई छोटी सी चूक कहें आखिर अनाधिकृत कालोनियों को सर्टीफिकेट बांटने की सरकार व पार्टी की एक बड़ी उपलब्धि सरकार को गौरवान्वित करने के बजाय शर्मसार कर गई। एक ओर हंगामे, मारपीट व अव्यवस्थाओं ने इस रैली को पलीता लगा दिया तो दूसरी और सोनिया के कद के अनुरूप भीड़ जुटाने मे ंभी सरकार असफल साबित हुई। छत्रासाल स्टेडियमें आज आयोजित कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की रैली का आयोजन प्रदेश सरकार के शहरी विकास विभाग की ओर से किया गया था। इस रैली को आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था । इस रैली के माध्यम से अनाधिकृत कालोनियों के 40 लाख निवासियों के वोटों का रुख कांग्रेस की झोली की ओर करने की रणनीति सरकार ने बनाई थी और यह रैली इन कालोनियों के मुद्दे पर विपक्ष के लगातार हमलों का जवाब भी थी। पिछले दिनों अनाधिकृत कालोनी मुद्दे पर भाजपा की सफल रैली के बाद इस रैली को सफल बनाना सरकार के लिए एक चुनौती भी थी लेकिन सरकार और पार्टी आज इस चुनौती का सामना करने में विफल रही। रैली स्थल पर तमाम अव्यवस्थाएं तो थी ही साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कद के अनुरूप भीड़ का भी अभाव था। स्टेडियम को खाली देख मंच पर बैठी मुख्यमंत्राी व पार्टी के अन्य दिग्गज भी परेशान दिखाई दे रहे थे। सोनिया गांधी के पहुंचने तक स्टेडियम में कुछ भीड़ तो जुट गई लेकिन रही सही कसर किसानों के हंगामें और उसके बाद महिलाओं के साथ हुई मारपीट ने पूरी कर दी। रैली स्थल पर जिस तरह पत्राकार दीर्घा के ठीक पीछे लगभग दो दर्जन महिलाएं व पुरुष अचानक पहुंचे और सोनिया गांधी हाय हाय के नारे लगाने लगे उससे स्पष्ट था कि यह हंगामा पूर्व नियोजित था। आयोजक तथा सरकार का खुफिया तंत्रा इस हंगामे का अंदाजा लगाने में असफल रहा। रैली में प्रवेश निमंत्राण पत्रों के माध्यम से था और मजेदार बात यह थी कि हंगामा करने वाले किसानों के पास भी निमंत्राणपत्रा थे, एैसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि पार्टी में गुटबाजी के चलते ही पार्टी के ही कुछ नेताओं ने ही हंगामे का खेल करा दिया है। हालांकि पार्टी इसे विपक्ष की साजिश बता रही है लेकिन इस पूरे हंगामे के पीछे पार्टी की गुटबाजी भी साफ दिखाई दे रही है। आज की रैली में जो कुछ भी हुआ वह आगामी चुनाव की दृष्टि से पार्टी के लिए किसी भी दृष्टि से अच्छा शगुन नहीं है। रैली में जिस तरह सोनिया गांधी के आगमन तक भीड़ की इंतजार होती रही उससे आगामी चुनाव में कांग्रेस की स्थिति पर भी सवाल खड़ा हो रहा है। कुल मिलाकर यह दिखाई दिया कि रैली का प्रबंधन किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था, यदि रैली प्रबंधन में थोड़ी भी सर्तकता बरती गई होती तो संभवतः सरकार और पार्टी को एैसी शर्मनाक स्थिति का सामना न करना पड़ता।

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

सीएनजी संकट: जेब और रोजी पर मार

लम्बी होती सी एन जी वाहनों की कतार
समस्या का कारण
पैट्रोल की बढ़ती कीमतें बढ़ा रही हैं सीएनजी वाहनों की संख्या
सीएनजी वाहनों की बढ़ती संख्या से लंबी हो रही है कतार
वाहनों क संख्या के अनुपात में नहीं हैं सीएनजी स्टेशन
सीएनज की कमी नहीं, कमी है फिलिंग संसाधनों की
भूमि न मिलने से नहीं लग रहे हैं सीएनजी स्टेशन
भूमि के लिए 40 आवेदनों में से मात्रा आधा दर्जन स्थलों का हुआ आवंटन
संसाधनों के लिए ईपीसीए से भी की मदद की गुहार
कब होगा समाधान
राजधानी में एक मेगा स्टेशन व छह नये फिलिंग स्टेशन बनाने की योजना
दिसंबर तक होगा समस्या का पूरी तरह समाधान
एनसीआर के वाहनों के लिए एनसीआर में बनेंगे सीएनजी स्टेशन
नये स्टेशन खुलने में लगेंगे अभी छह माह

अब तक हुए उपाय
मौजुदा स्टेशनों की क्षमता बढ़ाने के लिए 54 हाईकैपिसिटी विदेशी कम्प्रेशर का दिया आर्डर18 कम्प्रेशर राजधानी पहुंचे
5 कम्प्रेशरों ने किया काम शुरु
अन्य कम्प्रेशर कर रहे हैं विद्युत भार की स्वीकृति का इंतजार

खपत और क्षमता
राजधानी में 13 लाख किलो सीएनजी खपत होती है प्रतिदिन
10.5 लाख किलो प्रतिदिन फिलिंग करने की है सभी स्टेशनों की क्षमता
कितने हैं सीएनजी स्टेशन
आईजीएल के स्टेशन 65पैट्रोल पम्पों पर लगे 75डीटीसी डिपो में लगे स्टेशन 23
सीएनजी स्टेशनों की संख्या है कुल 163


सीएनजी वाहनों की संख्या
सीएनजी बसें 22500
आटो रिक्शा 55000
छोटे माल वाहक वाहन 24500
एनसीआर से प्रतिदिन आने वाले सीएनजी वाहन लगभग 30 हजार
अन्य प्राइवेट वाहन 1.30 लाख


2.25 लाख प्राइवेट व सार्वजनिक वाहन प्रतिदिन भरवाते हैं सीएनजी
सीएनजी वाहनों की संख्या पिछले 2 वर्ष में
वर्ष 2005 एक लाख सीएनजी वाहन
वर्ष 2008 लगभग ढाई लाख सीएनजी वाहन
दो वर्ष में बढ़ गये 250 प्रतिशत सीएनजी यूजर्स


तपती धूप, भीषण गर्मी ऊपर से घंटो का इंतजार। रोटी कमाने घर से निकले हैं लेकिन नहीं पता कब नम्बर आयेगा और कब सवारी मिलेगी। फिर शाम हो गई तो मालिक को किराया भी देना होगा। साब यह संकट तो रोटी का संकट हो गया है, इस तरह कतार में लगे रहेंगे तो कब कमायेंगे और क्या खायेंगे। कभी दो घंटे तो कभी चार घंटे समय की बरबादी। क्या करें, और किससे कहें। सीएनजी स्टेशनों के लंबी कतार में खड़े आटो चालकों की यह पीढ़ा उनके तनावग्रस्त व थके चेहरे ही बता देते हैं। इन्द्रप्रस्थ गैस लिमिटेड के तमाम सीएनजी स्टेशनों पर आटो चालक हों या फिर कार चालक सभी सीएनजी भरवाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे है। दिन में कारों और आटो चालकों की कतार इन स्टेशनों के बाहर दिखाई देती है तो रात को ब्लूलाइन बसें कतार में दिखती हैं। लगभग एक लाख लोगों की रोजी रोटी सीएनजी पर निर्भर है। सीएनजी मिलेगी तो रोजी रोटी मिलेगी। यह तो रही आटो, टैक्सी चालकों और बस चालकों की पीढ़ा। निजी वाहन चालको ंकी पीढ़ा भी कम नहीं है। आफिस जाना हो या फिर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना हो, घर व आफिस के तमाम जरूरी कामों की तरह अब सीएनजी की कतार में इंतजार करना भी एक जरुरी काम हो गया है। निजी वाहन चालकों के सामने दो ही रास्ते हैं या तो महंगा पैट्रोल भरवाकर अपनी जेब खाली करें या फिर कतार में लग कर सीएनजी भरवायें। गनीमत है सीएनजी स्टेशनों पर निजी कारों में फिलिंग के लिए अलग मशीनें हैं अन्यथा सीएनजी भरवाने के लिए भी आफिस से छुट्टी लेनी पड़ती। सीएनजी ने राजधानी को प्रदूषण से मुक्त करने का सपना तो पूरा कर दिया लेकिन सीएनजी स्टेशनों पर लंबी होती वाहनों की कतार एक एैसी समस्या बन गई है जो आटो व बस चालकों की रोजी रोटी छीन रही है और अन्य वाहन चालकों का कीमती समय।
सीएनजी संकट का कारण
संकट सीएनजी का नहीं बल्कि सीएनजी फिलिंग का है। पैट्रोल की बढ़ती कीमतो के कारण सीएनजी वाहनों की संख्या बढ़ रही है और वाहनों के अनुपात में न तो सीएनजी स्टेशनों की संख्या बढ़ रही है और न ही मौजुदा स्टेशनों की क्षमता बढ़ रही है। पिछले चार माह से सीएनजी स्टेशनो ंपर बढ़ते दबाव के बाद सीएनजी स्टेशनों की संख्या बढ़ाने व कम्प्रेशर क्षमता बढ़ाने की दिशा में काम तो हुआ है लेकिन अभी उसका परिणाम आना बाकी है। इन्द्रप्रस्थ गैस लिमिटेड (आईजीएल) की अपनी मजबूरियां हैं। गेल से सीएनजी की कोई कमी न होने के बावजूद आईजीएल बेबस है क्योंकि आईजीएल को नये स्टेशनों के लिए भूमि ही नहीं मिल रही है। राजधानी में सीएनजी आपूर्ति की जिम्मेदारी आईजीएल पर है और गैस अथारिटी आफ इंडिया (गेल) की ओर से आईजीएल को प्रतिदिन 2 मिलियन स्टेण्डर्ड क्यूबिक मीटर सीएनजी गैस ़आवंटित है और राजधानी में सीएनजी की मौजुदा खपत 1.6 मिलियन स्टेण्डर्ड क्यूबिक मीटर है। इससे स्पष्ट है कि सीएनजी की कोई कमी नहीं है और आईजीएल को खपत से ज्यादा सीएनजी आवंटित हो रही है। सीएनजी स्टेशनो ंपर वाहनों की बढ़ती कतार से इनवायरनमेंट पोलुशन प्रिवेंशन एण्ड कण्ट्रोल अथारिटी (ईपीसीए) भी चिंतित है और ईपीसीए इस संबध में आईजीएल को अपनी चिंता से अवगत भी करा चुकी है। प्रतिदिन एनसीआर से आने वाले लगभग 30 हजार निजी सीएनजी वाहन भी इस समस्या को बढ़ा रहे है।
समाधान की क्या है योजना
सीएनजी के इस संकट का समाधान करने के लिए आईजीएल ने 54 हाईकैपिसिटी कम्प्रेशर विदेश से आयात किये हैं जिनमें से 18 आईजीएल को प्राप्त हो चुके हैं और पांच कम्प्रेशर प्रगति मैदान आईपी इस्टेट, मैकटाफ, ओखला फेस 1, नरेला व मयूर विहार में लगाये गये हैं लेकिन बाकी 13 कम्प्रेशर अभी भी चालू होने का इंतजार कर रहे हैं, इसका प्रमुख कारण आईजीएल स्टेशनों को इन कम्प्रेशरों के मुताबिक विद्युत भार स्वीकृत न होना है। इसके अलावा समय की बचत के लिए प्रिसेट डिस्पेंसर भी लगाये जा रहे हैं। सौ से अधिक डिस्पेंसर मंगाये गये हैं। आईजीएल ने नये स्टेशन खोलने की तैयारी भी की है लेकिन भूमि उपलब्ध न होना एक बड़ी समस्या है, भूमि के लिए लगभग 40 आवेदनों में से मात्रा अभी तक केवल सरोजनी नगर व रोहिणी में ही भूमि आवंटित हुर्ह है। आईजीएल ने एनसीाअर से आने वाले वाहनों को एनसीआर में ही स्टेशन लगाकर सीएनजी उपलब्ध कराने की योजना बनाई है जबकि राजधानी के कंझावला में एक मेगा स्टेशन लगाये जाने के अलावा सीजीओ, मिन्टोरोड, रोहिणी फेस 2, मंगोलपुरी फेस 2, पीतमपुरा व सरोजनी नगर में नये स्टेशन लगाया जाना प्रस्तावित है। यह स्टेशन लगाने में कम से कम छह माह का वक्त लगेगा।
यूं तो होने लगेगी मारामारी
सीएनजी स्टेशनों पर कतार में लगे वाहन चालक कहते हैं कि यदि इसी तरह कतार बढ़ती रही तो सीएनजी के लिए मारामारी होने लगेगी। इन्द्रप्रस्थ स्टेशन के बाहर कतार में लगे वैशाली गाजियाबाद निवासी शील गुलाटी का कहना था कि जब तक सीएनजी स्टेशनों की संख्या नहीं बढ़ेगी संकट का समाधान नहीं होगा। वह बताते हैं कि कभी आधा घंटा तो कभी डेढ़ घंटा उन्हें कतार में लगता है। एक बड़ी कम्पनी के अधिकारी एस.शंकर कहते हैं कि उन्हें प्रतिदिन 45 मिनट सीएनजी के लिए खर्च करने पड़ते हैं। वह कहते हैं कि मौजुदा स्टेशनो ंपर मशीनों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। वैशाली के ही अशोक सोनी कहते हैं कि वह एक दिन के अंतराल में सीएनजी भरवाने आते हैं और लंबा इतजार करते है। वह कहते हैं कि सरकार को कुछ करना चाहिए तभी समाधान होगा। सीएनजी संकट से प्रतिदिन दो तीन घंटे कतार में लगने वाले आटो चालक सुशील कुमार का कहना है कि जितना समय सीएनजी भरवाने में लगता है उतने समय में वह दो सौ रुपये कमा सकता है लेकिन रोजाना उसे यह नुकसान सहना पड़ता है। मोतीहारी से दिल्ली में आटो चलाने आये सुरेन्द्र यादव का कहना है कि अब तो यह रोज की समस्या है, क्या करें बच्चों को रोटी खिलानी है तो लाइन में लगना ही होगा। विनोद नगर निवासी बच्चे लाल का कहना था कि उसे आज दो घंटे लाइन में हो गये हैं लेकिन अभी तक नम्बर नहीं आया है, यही स्थिति रोज होती है। उसका कहना था कि मशीने बढ़ाकर समाधान किया जा सकता है।

कांग्रेस के डेढ़ दर्जन विधायकों की टिकट पर सवाल

देना होगा जवाब निगम चुनाव की हार का
अपनी करतूतों से पार्टी को संकट में डालने वाले भी नप सकते हैं
निगम चुनाव में एक भी वार्ड नहीं जितवा पाये कई विधायक


कांग्रेस के लगभग डेढ़ दर्जन मौजुदा विधायकों को विधानसभा चुनाव में पुनः प्रत्याशी बनाये जाने पर पार्टी के भीतर ही सवाल उठाये जा रहे हैं। यह विधायक एैसे हैं जो निगम चुनाव के दौरान अपने विधानसभा क्षेत्रा के एक भी वार्ड में कांग्रेस प्रत्याशी को नहीं जितवा सके हैं। इन विधायकों से अब पूछा जायेगा कि उनके क्षेत्रों में पार्टी की इतनी दुर्गति क्यों हुई और विधानसभा चुनाव में उनकी जीत के दावे का आधार क्या है। इसके अलावा समय समय पर अपने कारनामों से पार्टी व सरकार को संकट में डालने वाले विधायकों पर भी गाज गिर सकती है। पार्टी हाईकमान ने एैसे सभी विधायकों की सूची तैयार कर ली है। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी हाईकमान किसी भी कीमत पर निगम चुनाव की पुनरावृत्ति नहीं चाहता, यही कारण है कि प्रत्याशियों के चयन में भी पूरी सावधानी बरती जा रही है और केवल चुनाव में विजय हासिल करने में सक्षम उम्मीदवारों को ही चुनाव मैदान में उतारे जाने की रणनीति बनाई जा रही है लेकिन पार्टी हाईकमान की दुविधा यह है कि डेढ़ दर्जन मौजुदा विधायक एैसे हैं जिनके क्षेत्रों में निगम चुनाव के दौरान पार्टी को सभी वार्डो में करारी हार का सामना करना पड़ा। यह विधायक एक भी वार्ड में पार्टी प्रत्याशी की जीत नहीं करा सके, जिससे अब इनकी अपनी जीत पर भी सवाल लगा है।इन विधायकों में प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व रोहतास नगर के विधायक रामबाबू शर्मा, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्राी व मालवीय नगर के विधायक डा।योगानंद शास्त्राी और राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा व आर.के.पुरम से विधायक बरखा सिंह भी शामिल हैं। इनके अलावा नरेला विधानसभा क्षेत्रा के विधायक चरण सिंह कंडेरा, बुराड़ी के विधायक जिले सिंह, तिमारपुर के विधायक सुरेन्द्र पाल सिंह बिटटू, बवाना के विधायक सुरेन्द्र कुमार, परिसीमन में नई सीट बनी मुंडका से दावेदार व नांगलोई के विधायक विजेन्द्र सिंह, शकूर बस्ती के विधायक डा.एस.सी.वत्स, माडल टाऊन के विधयक कुंवर करण सिंह, राजौरी गार्डन के विधायक रमेश लांबा, विकासपुरी के विधायक मुकेश शर्मा, नई सीट बनी बिजवासन से दावेदार व महीपालपुर के विधायक विजय सिंह लोचव, महरौली के विधायक व अब छतरपुर सीट से दावेदार बलराम तंवर, विश्वास नगर के विधायक नसीब सिंह व गोण्डा सीट से विधायक भीष्म शर्मा एैसे विधायक हैं जो निगम चुनाव के दौरान अपने विधानसभा क्षेत्रा से एक भी सीट पार्टी की झोली में नहीं डलवा सके। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए उक्त सभी विधायक दावेदार हैं लेकिन पार्टी हाईकमान के कुछ नेताओं ने इन सभी विधायकों की दावेदारी पर सवाल लगा दिया है। पार्टी के केन्द्रीय हाईकमान का कहना है कि यदि यह सभी दावेदार अपनी जीत का दावा कर रहे हैं तो उन्हें अपनी दावेदारी से पहले यह भी बताना चाहिए कि यदि उनकी अपने क्षेत्रा में पकड़ है तो फिर निगम चुनाव में उनके क्षेत्रो ंसे पार्टी का सूपड़ा ही साफ क्यों हो गया। इसके अलावा विकास पुरी के विधायक मुकेश शर्मा एवं शकूर बस्ती के डा.एस.सी.वत्स पर एक अन्य आरोप अपने कारनामों से पार्टी व सरकार को संकट में डालने का भी है। मुकेश शर्मा ने बिजली बिलों के मुद्दे पर सचिवालय पर भीख मांग कर सरकार को कठघरे में खड़ा किया था तो डा.एस.सी.वत्स ने अपनी ही सरकार के खिलाफ रिर्पोट देकर सरकार की छीछालेदारी कराई थी। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के मुताबिक चुनाव में उन्हीं उम्मीदवारों को टिकट दिया जायेगा जो जीतने में सक्षम होंगे तथा पार्टी के प्रति वफादार होंगे। उन्होंने कहा कि यदि कोई विधायक इस योग्यता को पूरा नहीं करेगा तो उनसे पूछा जायेगा कि चुनाव में उनकी जीत का आधार क्या है। उन्होंने बताया कि इस बारे में निर्णय स्क्रीनिंग कमेटी को ही करना है।